Saturday, November 4, 2023

जिन स्मरण

• णमोकार मन्त्र 

https://youtu.be/fUntR5T4bJQ?feature=shared


• भक्तामर स्तोत्रम्

https://youtu.be/UPF4YwJKFIQ?si=9tlAC0T3fTx7H7uy


• गणधर वलय स्तोत्रम्

https://youtu.be/mgZiTnPrOH4?si=-l3zx2quXgzjycpH


• सरस्वती स्तोत्रम

https://youtu.be/k7aF7Hak-h4?si=X3OjbQAkkV9ltYfS


• सरस्वती नाम स्तोत्रम

https://youtu.be/OiuuxEwO0yY?si=a0TTbLRybQbW0wqP


• मंगल पंचकम

https://youtu.be/FqwiuDSkDEA?si=YTi1l1rNYeaSzOEG


• संकट मोचन विनती

https://youtu.be/FViOFwpYxn8?si=kM0iqoZJ9xfzMBBu


• दुःख हरण विनती

https://youtu.be/4xgXBLB6qbs?si=PfD0huyhvV2j1mZf


• पार्श्वनाथाष्टक स्तोत्रम

https://youtu.be/fmyhaFKEbPA?si=hKpSvmyAgViH2Uea


• आत्म भावनाष्टक

https://youtu.be/1VLBSjLw-6c?si=i7xu5Kw9VKgdayEA


• दर्शन पाठ

https://youtu.be/tYl2a2FDkrQ?si=RWnoWURu28M6MWDo


• दृष्टाष्टक स्तोत्र

https://youtu.be/uuGP0FlFDgg?si=y9fPbOaQEDZlpe2G

॥ नित्य श्री जानेश्वरी ॥

॥ नित्य श्री

 ज्ञानेश्वरी ॥ अध्याय १ | ओवी क्रमांक ११०


हे अप्रतिमल्ल जगीं । पुरता प्रतापु अंगीं । परी सर्व प्राणें मजचि लागी । आरायिले असती ॥११०॥


जगात ज्यांच्या तोडीचा दुसरा योध्दा नाही, ज्यांच्या अंगात पुरेपूर बळ आहे, असे हे सर्व वीर असूनही जीवाभावाने मलाच अनुसरले आहेत. ११०

अध्याय १ | ओवी क्रमांक ७९


जातें कामधेनु माये । तयासी अप्राप्य कांहीं आहे । म्हणौनि मी प्रवतों लाहें । ग्रंथीं इये ॥७९॥


ज्याची आई कामधेनू आहे; त्याला जगात दुर्मिळ असे काय आहे? त्याप्रमाणे श्रीगुरू आणि संत यांचा मला आधार आहे, म्हणून मी या गीता ग्रंथाकडे प्रवृत्त झालो आहे. ७९.

॥ नित्य श्री ज्ञानेश्वरी ॥


• अध्याय १ | ओवी क्रमांक ३३


म्हणौनि हा काव्यांरावो। ग्रंथ गुरुवतीचा ठावो। एथूनि रसां झाला आवो | रसाळपणाचा ॥ ३३॥


म्हणूनच हा महाभारत ग्रंथ, काव्यांचा राजा असून इतर ग्रंथांच्या मोठेपणाला उगम झाला. आहे, आणि शृंगारादि रसांना रसाळपणाचा डौल देखील या महाभारतापासूनच प्राप्त झाला आहे. 22.

पार्टी नकोय मित्रा तुझी

 पार्टी नकोय मित्रा तुझी 

येवून फक्त भेटत जा,

काय चाललंय मनात तुझ्या 

भेटून फक्त बोलत जा, 

🙏🙏

मोकळं सोड स्वतःला जरा 

कधीतरी मोकळं होत जा, 

हलकं वाटेल तुझंच तुला 

मन रिकामं करत जा, 

🙏🙏

जुन्या आठवणी गप्पागोष्टी 

आमच्यात सुद्धा रमत जा, 

आलेच कधी वाईट विचार 

बिनधास्त फोन करत जा, 

🙏🙏

काय आहे आयुष्य अजून 

निदान मनातले वाटत जा, 

पहा किती फरक पडतो 

आनंद तेव्हढा लुटत जा, 

🙏🙏

पन्नाशीला आलोय आपण 

संपर्कात तेव्हडं रहात जा, 

काय हवं काय नको तुला 

कुणाला तरी सांगत जा, 

🙏🙏

मित्र असतात कशासाठी 

मैत्री तेव्हढीच जपत जा, 

आम्ही फक्त मस्त जगतो 

तसाच मस्त जगत जा, 

🙏🙏

पैसा नाही लागत त्याला 

मनातले मात्र सांगत जा, 

पार्टी नकोय मित्रा तुझी 

येवून फक्त भेटत जा,

तुर्की के इन खंडहरों में हनुमानजी की मूर्ति भी मिली है

 तुर्की के इन खंडहरों में हनुमानजी की मूर्ति भी मिली है 

यह तुर्की की 12,000 वर्ष पुरानी सभ्यता के खंडहर बताए जा रहे है , जिसका नाश आज के कोई 5500-6000 वर्ष पूर्व हो गया था Göbeklitepe के उन खंडहरों में हिन्दू देवी देवताओं ( हनुमान, नृसिंहः ) आदि की मूर्तियां भी मिली है, जो इस बात का प्रमाण है, की सनातन धर्म के अलावा अन्य दूसरा सत्य है ही नही, अन्य सभी पंथ है,भरम हैआप खुद भी गूगल कर सकते है..



 हिंदवी स्वराज्य सेनेतील मावळ्यांचे वंशज सेनापती हंबीरराव मोहिते यांचे वंशज श्री जयाजीराव मोहिते यांनी आज 311 गडकोट बांधलेले 360 पेक्षा जास्त किल्यांची डागजुगी केलेले सर्वात महत्वाचे सेवेशी तत्पर हिरोजी इंदुलकर रायगड ज्यांनी बांधला ते हिरोजी इंदुलकर यांचे वंशज व डुबल इनामदार सरकार यांची सूर्यस्थानला भेट दिली व आवडीने मिसळ खाल्ली “कोई भी संबंध स्वयं की इच्छा से नहीं जुड़ता, आपको कब, कहाँ और किससे मिलना है,ये केवल ईश्वर तय करते हैं”



G20 से एक अविश्वसनीय उपलब्धि


शक्तिशाली देश अपने रास्ते जैसे तैसे बना लेंगे और कमजोर देश गृहयुद्ध में उलझे रहेंगे।


प्राचीन काल मे सिर्फ भारत और चीन निर्यात के सम्राट थे। दोनों देश यूरोप को अपना सामान बेचते थे, भारत इसके लिये अपना सिल्क रुट प्रयोग करता था। राजस्थान से ऊँट पर सामान लाहौर पेशावर और कांधार होते हुए मध्य एशिया में प्रवेश करता था और वहाँ से यूरोप। चीन सीधे उज्बेकिस्तान से सामान भेजता था।


लेकिन अब समीकरण बदल गए है, बीच मे पाकिस्तान आ गया है जिसने हमारा सिल्क रुट रोक दिया है। चीन भी मध्य एशिया में दुश्मनी निभाये बैठा है। ऐसे में दोनों देशों ने अलग अलग रास्ते बना लिए।


चीन ने बेल्ट एंड रोड अभियान चलाया, उद्देश्य तो दूसरे देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का था लेकिन चीन कर्ज के जाल में फसाने लग गया। एक बार को तो चीन ने इटली को इसमे शामिल करके नाटो देशों की नींद उड़ा दी थी। लेकिन जब से जॉर्जिया मेलोनी सत्ता में आयी उन्होंने इस BRI प्रोजेक्ट को लगभग बाहर कर दिया है।


चीन इसी वजह से धरा रह गया, दूसरी ओर भारत ने पहले पाकिस्तान से बात की जो कि निःसन्देह बननी ही नही थी। फिर भारत ने ईरान को अप्रोच किया लेकिन ईरान पर प्रतिबंध इतने लगे है कि जिसकी हद नही।


लेकिन दिल्ली डिक्लेरेशन ने भारत की किस्मत हमेशा के लिये बदल दी। भारत को अब पुराने सिल्क रूट की जरूरत ही नही पड़ी। भारत मिडिल ईस्ट कॉरिडोर 5 साल में बन जायेगा। उद्देश्य है कि गुजरात या मुंबई से पहले सारा समान जहाजो में भरकर दुबई जाएगा वहाँ से ट्रेन कनेक्शन होगा और ये सऊदी अरब, जॉर्डन तथा इजरायल पहुँचेगा।


इजरायल में अडानी जी का बंदरगाह पहले ही है वहाँ से यह सामान ग्रीस और इटली पहुँच जाएगा। यदि पाकिस्तान सिल्क रुट बना लेने देता तो भारत का भारी नुकसान होता क्योकि उसमें 1 दर्जन से ज्यादा देशों पर निर्भरता बढ़ती समय भी लगता।


लेकिन अरब के द्वार जिस तरह से खुले है वो अभूतपूर्व है, पाकिस्तान के पास कमाई का बहुत अच्छा साधन होता लेकिन अपने अहंकार में वो अब कही का नही बचा क्योकि भारत के अलावा और कोई देश नही है जिसे निर्यात के लिये पाकिस्तान की आवश्यकता हो। बीच मे होकर भी अकेला होना इसे कहते है।


इसमे और भी देशों का नुकसान हुआ है तुर्की की जरूरत 60% समाप्त हो गयी है। मिस्र को भी नुकसान हुआ है क्योकि उसकी स्विस कनाल ना के बराबर प्रयोग होगी। हालांकि मिस्र को भारत ने आश्वासन दिया है कि मध्य अफ्रीका में निर्यात के लिये उसकी धरती भी हम प्रयोग में लेंगे।


लेकिन सबसे बड़ा कष्ट चीन को पहुँचा है उसके पास एक ही तरीका बचा है कि वो भारत से संबंध सुधारे और एक चीन भारत कॉरिडोर की सोचे लेकिन ये आज के समय मे तो बस ख्याली पुलाव है। 


2013 में एक समय था जब महान अर्थशास्त्री सोच रहे थे कि बिना चीन के तो हम यूरोप से जुड़ नही पाएंगे। 2023 में एक समय है जब चायवाले ने भारत को सीधे अरब और यूरोप से जोड़ दिया तथा चीन को साइड में बैठा दिया।


एक वोट की ताकत यही होती है, 2024 में सिर्फ भारत को देखकर वोट मत कीजिये। यह वोट अरब और यूरोपीय देशों को देखकर भी कीजिये जहाँ के लाखों लोगों की आशाएं इस एक कॉरिडोर पर टिकी है।


अंत मे फिर वही की भारत, सऊदी और इटली जैसे ताकतवर देश तो अपना रास्ता बना लेते है लेकिन चीन और पाकिस्तान जैसे कमजोर देश घमंड की आग में जलकर पूरी दुनिया से कट जाते है।


जय हिंद जय हिन्दुराष्ट्रम

मनुस्मृति

भगवान राम के समय भी मनुस्मृति थी। तो भगवान राम ने भीलनी के जूठे बैर, निषाद राज के साथ मित्रता और अपने राज तिलक पर मुख्य अतिथि निषाद राज को बनाया। और केवट को भी अपने बराबर का दर्जा दिया। भील समुदाय से भीलनी और निषाद समुदाय से निषादराज और मल्लाह समुदाय से केवट आजकल सारे दलित कहलाने लगे हैं। 


तो यह कैसे संभव था? और अगर ब्राह्मणवाद हावी था। तो राम क्षत्रिय थे, फिर ब्राह्मण राम की पूजा क्यों करते हैं और रावण का पुतला क्यों जलाते हैं? अगर सती प्रथा अनिवार्य थी मनुस्मृति में तो राम के समय भी थी तो दशरथ की तीन पत्नियां सती क्यों नहीं हुई? राजा शांतनु की पत्नी सत्यवती क्यों सती नहीं हुई। चित्र वीर्य विचित्र वीर्य की पत्नियों अंबिका और अंबालिका क्यों सती नहीं हुई? कंस, जरासंध, शिशुपाल की पत्नियाँ क्यों सती नहीं हुई। लाखों योद्धा महाभारत के युद्ध में मारे गए उनकी पत्नियां क्यों सती नहीं हुई। चंद्रगुप्त मौर्य बिंदुसार गुप्त मौर्य सम्राट अशोक गुप्त मौर्य एवं हर्षवर्धन इत्यादि की पत्नियाँ सती क्यों नहीं हुई? 


क्या कारण था कि मुगलों के आने के बाद सती प्रथा शुरू हुई। कारण सीधा था हमारी जिस प्रकार आज आपस में एक दूसरे से नफरत और फूट है। इस प्रकार एक क्षत्रिय की दूसरे पर क्षत्रिय से एक राजा की दूसरे राजा से आपस में फूट के कारण जब मुग़ल हमला करते थे जो समूह में अरब इस्लामी देशों से आए थे और राजा को मार दिया जाता था और राजा के राज्य पर कब्जा कर लिया जाता था। 

तो उनकी राजकुमारी और रानियों को यौन दासियों के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया जाता था और अपना ही समाज जो दूसरे राज्य में राजा होता था। वह तालियां बजाता था उसे राजा के हारने पर और उन रानियों और राजकुमारी को यौन दासियों के रूप में प्रयोग होने पर। तब उन राजकुमारियां एवं रानियों ने मुगलों के अत्याचार से भयभीत होकर आत्मदाह करना या सती होना या जिसको जौहर कहते हैं वह करना शुरू कर दिया। 


-मतलब तुर्क और मुगलों के यौन उत्पीड़न के भय से ग्रसित होकर आत्मदाह की प्रक्रिया शुरू हुई उसको सती प्रथा कह दिया बाद में जब देखा गया कि अब मुगलों का भय समाप्त है। तो फिर राजा राममोहन राय को बंगाल के संन्यासियों ने समर्थन दिया और उस प्रथा को बंद करवा दिया। उस प्रथा का तो आज भी पता चलता है कि हिंदू एक शादी करता है और अरब में आज भी लोगों को यौन दासियों के रूप में वहु विवाह व्यवस्था रखी गई है संविधान के अनुसार भी। 


जय श्री राम हर हर महादेव 

गणेश पूजनादरम्यान वापरल्या जाणाऱ्या २१ प्रकारच्या पानाबद्दल काय म्हणते आयुर्वेद? काय आहेत याचे फायदे....

 १. अगस्ती(हादगा)* 

            प्राचीन ग्रंथांमध्ये नेत्रविकारांवर अगस्तीचे प्रयोग सापडतात. जीवनसत्त्व 'अ' हे दृष्टीला पोषक असते. अ जीवनसत्त्वाचे वनस्पतिज रूप अर्थात बीटाकॅरोटिन हे तत्त्व अगस्तीच्या पानांमध्ये ४५००० यूजी- एवढय़ा प्रचंड प्रमाणात, म्हणजे गाजरापेक्षा कितीतरी जास्त प्रमाणात असते.


 २. अर्जुन 

                 अर्जुन हा वृक्ष त्याच्या हृदयपोषक गुणधर्माबद्दल प्रसिद्ध आहे. 'अर्जुनारिष्ट' हे हृदयावरील औषध प्रसिद्ध आहेच. अर्जुनामध्ये मुबलक प्रमाणात असणाऱ्या नैसर्गिक कॅल्शिअममुळे अर्जुनाच्या सेवनाने हाडे हस्तिदंताप्रमाणे मजबूत होतात, अशी आयुर्वेदाची मान्यता आहे.


 ३. आघाडा 

               आघाड्याचे बरेचसे गुणधर्म हे स्त्रियांसाठी-स्त्रीरोगांवर, विशेष उपयुक्त असे आहेत.


 ४. कण्हेर 

              कण्हेर हिचा उपयोग तारतम्याने करतात, कारण कण्हेरीच्या विषबाधेने हृदय व श्वसनक्रिया बंद पडून आकडी येऊन तोंड वेडेवाकडे होते.


 ५. केवडा 

               केवड्याच्या फुलाच्या रसामध्ये तयार केलेले तूप सेवन केल्यास ते मूत्रविकारावर उपयोगी पडते. दीर्घकालीन डोकेदुखीमध्ये किंवा इतर शिरारोगांमध्ये केवड्याचा लेप लावला जातो.


 ६. जातिपत्र 

                जाई व्रणरोपक आहे. एखादा बरा न होणारा व्रण (जखम) जाईच्या पानांच्या काढ्याने धुऊन, त्या जखमेवर ठेचलेली पाने लावली असता जखम बरी होते.


 ७. डाळिंब 

                चवीला आंबट असूनही पित्तशामक असलेल्या निवडक फळांमध्ये आवळ्याबरोबर डाळिंबाचा समावेश होतो. डाळिंब आतड्याच्या रोगांवरचे गुणकारी औषध आहे. मुळाची साल ही कृमिघ्न आहे; विशेषत टेपवर्मचा (चपटय़ा कृमीं) त्रास याने नाहीसा होतो.


 ८. डोरली 

             डोरलीसारखे रूप असणाऱ्या रिंगणीच्या फळांचा व बियांचा धूर तोंडामध्ये घेतल्यास दंतकृमींचा त्रास कमी होतो, दातदुखी कमी होते आणि दात किडण्याची प्रक्रिया थांबते.


 ९. तुळस 

                 तुळशीचा सर्वप्रसिद्ध गुणधर्म म्हणजे तुळस ही सर्दी-कफ-तापावरचे प्रभावी औषध आहे. पावसाळ्याच्या दिवसात तर घरामध्ये तुळस असायलाच हवी, इतकी तुळस त्या दिवसांमधील विविध आजारांवर उपयुक्त आहे. गजकर्ण (रिंगवर्म) या त्वचाविकारावर तुळशीचा रस लावल्यास फायदा होतो.


 १०.दूर्वा 

            गणपती हे तेज (उष्ण) तत्त्वप्रधान दैवत आहे आणि उष्णतेचे शमन करणारी एक प्रमुख वनस्पती म्हणजे दूर्वा. आयुर्वेदात वर्णिलेल्या पित्तशामक वनस्पतींमध्ये दूर्वा हे एक आद्य औषध आहे.


 ११.देवदार 

                 चरकसंहितेमधील अनेक रोगांवरील औषधी-प्रयोगांमध्ये देवदाराचा समावेश आहे. देवदाराच्या झाडाला सुरदारू असेसुद्धा म्हटले जाते.


 १२.धोत्रा 

               धत्तूरपत्र म्हणजे धोत्र्याची पाने हे श्वसनविकारावरील एक प्रभावी औषध आहे. परंतु धोत्र्याचा विषारी गुण योग्य-पर्याप्त मात्रेमध्ये वापरल्यासच औषधासारखा उपयोगी पडतो; अन्यथा घातक होऊ शकतो.


 १३.पिंपळ 

                पिंपळ हा भारतातील अतिशय प्राचीन असा वृक्ष आहे; ज्याचे संदर्भ आयुर्वेदच नव्हे तर ऋग्वेदामध्येही सापडतात. संपूर्ण समाजाच्या आरोग्याची काळजी घेणाऱ्या पिंपळासारख्या वृक्षांची लागवड आणि जतन करण्याची आठवण गणेशपूजनाच्या निमित्ताने करून देण्यात आलेली आहे.


 १४.बेल 

                बिल्व या नावाने ओळखली जाणारी ही वनस्पती आतड्यांच्या आजारांवरील एक उत्तम औषध आहे. बेलाची तयार औषधे : बिल्वादी चूर्ण, बिल्वावलेह, बेल-मुरांबा, इत्यादी.


 १५.बोर 

           बोराच्या बीचे चूर्ण पाण्याबरोबर घेतल्यास सारखी खा-खा होण्याचा आजार कमी होतो. बोराच्या पानांची चटणी तांदुळाच्या कांजीबरोबर घेतल्यास माणसाचा लठ्ठपणा कमी होतो.


 १६.मरवा 

                मरवा अतिशय आल्हाददायक सुगंधी असतो. शरीराच्या कार्यामध्ये महत्त्वाची भूमिका बजावणारे हार्मोन्स तयार करणाऱ्या सर्व अंतस्रावी ग्रंथींची राणी समजल्या जाणाऱ्या पियूषिका ग्रंथीला उत्तेजना देण्याचा नैसर्गिक सुगंधाहून दुसरा सोपा उपाय नाही, असे आयुर्वेद म्हणतो.


 १७.मधुमालती 

               मधुमालती म्हणजे मालती ही पत्री प्रामुख्याने मुखरोगांवर उपयुक्त वनस्पती आहे.


 १८.माका 

                 भृंगराजपत्र अर्थात माक्याची पाने माक्याचा महत्त्वाचा उपयोग म्हणजे 'केश्य गुणधर्म'. केसांची वाढ आणि रंग या दोन्ही पातळ्यांवर तो उपयोगी ठरतो.


 १९.रुई 

               अर्कपत्रे म्हणजे रुईची पाने. रुई उत्तम कफनाशक औषध आहे. एकंदरच शरीरातील विविध ग्रंथींना उत्तेजना देऊन त्यांचे कार्य सुधारणारे आणि पर्यायाने शरीराचा चयापचय निरोगी करणारे असे हे औषध आहे.


२०.विष्णूक्रान्ता 

               विष्णूक्रान्ता म्हणजे शंखपुष्पी  बुद्धि-स्मृतिवर्धक म्हणून सुप्रसिद्ध असणारी ही शंखपुष्पी, बुद्धीवर आलेले मांद्याचे विघ्न दूर करते.

२१.शमी

शमी हा शब्द 'शमयति रोगान् इति' म्हणजे रोगांचे शमन करणारी ती शमी असा तयार झालेला आहे.

प्रमोद पाठक.

नव्या संसद भवनाच्या बांधकामात कोल्हापूरच्या उद्योजकांचे योगदान


देशाच्या नवीन संसद भवनाच्या बांधकामासाठी लागणारे पिलर उभे करण्याचे साहित्य technos n plastos या गोकुळ शिरगाव येथील कारखान्यात बनवले गेले. 


दीपक सांगलीकर आणि गौरव सांगलीकर यांची ही उद्योग संस्था आहे. 


- नवीन संसद भवन अर्थात सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट मध्ये बांधकामामध्ये अष्टकोनी कॉलम साठी लागणारे  4.8m उंचीचे  formwork material single pour lift साठी डिझाईन केलेले होते,


- वरील फोटो मध्ये असलेले निळ्या रंगाचे moulds वापरल्यामुळे बांधकाम जलद गतीने पूर्ण झाले


- सामान्य स्थितीत 6-8 आठवडे लागतील हे काम 15 दिवसात संपवण्यासाठी विशेष मेहनत घ्यावी लागली,


-देशासाठी महत्त्वाची इमारत असल्याने, आणि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे संस्कार असल्याने सांगलीकर यांनी हा प्रोजेक्ट ना तोटा ना नफा प्रणाली वर पूर्ण केला,


- हे काम tata projects या company मार्फत त्यांनी पुर्ण केले. 


कोल्हापूरच्या उद्योजक परंपरेने देशासाठी अनेकदा योगदान दिले आहे, त्याच परंपरेचे पालन सांगलीकर पिता पुत्रांनी केले आहे, हे कोल्हापूरला अभिमानास्पद आहे

तामिळनाडू मधील हे मंदिर "नाडी गणपती"

 तामिळनाडू मधील हे मंदिर "नाडी गणपती" म्हणून ओळखले जाते, त्याच्या नावामागच कारण ही तसच आहे.



पूज्य आदरणीय श्री मौनस्वामी यांना सिद्धी विनायकाची मोठी मूर्ती स्थापित करण्यासाठी आमंत्रित करण्यात आले होते, यासाठी त्यांना आवश्यक विधी आणि अभिषेक करावा लागणार होता..


पूज्य आदरणीय श्री मौनस्वामींनी प्राणप्रतिष्ठा प्रक्रिया सुरू केली तेव्हा काही नास्तिकांनी दगडाच्या मूर्तीत जीव कसा आणता येईल असे म्हणत त्यांची खिल्ली उडवली. मग आदरणीय श्री मौनस्वामींनी त्यांना मूर्ती तपासणीसाठी डॉक्टरांना बोलवण्यास सांगितले.


सर आर्कबाल्ड एडवर्ड हे त्यावेळच्या प्रांताचे ब्रिटिश गव्हर्नर व्हीआयपी अतिथी म्हणून कार्यक्रमाला आले होते आणि तेही हे सर्व ऐकत होते आणि पाहत होते.


नास्तिकांनी पुतळ्याची नाडी तपासण्यासाठी ब्रिटीश डॉक्टरांना बोलावले. डॉक्टरांनी मूर्तीची कोणतीही नाडी तपासली असता नाडी आढळली नाही. तेव्हा पूज्य आदरणीय श्री मौनस्वामी म्हणाले, आता मी प्राणप्रतिष्ठा करीन आणि मग तुम्ही पुन्हा तपासू शकता.


प्रतिष्ठापना सोहळ्यानंतर आरतीच्या वेळी मूर्ती हलत असल्याचे आणि मूर्तीच्या हालचालीही दिसत असल्याचे भाविकांच्या लक्षात आले.. शिवाय, मूर्तीच्या नाडीसह हृदयाचे ठोके देखील मनुष्याप्रमाणेच स्पष्टपणे दिसले. ब्रिटीश वैद्यांनी आणि अगदी नास्तिकांनी देखील कसून तपासणी केली आणि त्यांच्या स्टेथोस्कोपद्वारे नाडीचे ठोके स्पष्टपणे आढळले. हे बघून उपस्थित असलेल्याना आश्चर्याचा धक्का बसला..


तिरुनेलवेली जिल्ह्यातील भूवैज्ञानिकांनी पुतळ्याचे परीक्षण केले आणि विचित्र घटनेची पुष्टी केली. ही नाडी काही तास चालू राहिली आणि नंतर पूज्य आणि आदरणीय श्री मौनस्वामींनी सांगितले की आता थांबेल आणि ती थांबली.


पुतळ्याचे परीक्षण करणारे वैद्य किंवा नास्तिक कोणीही त्याचे स्पष्टीकरण देऊ शकले नाहीत, ते विज्ञानाच्या पलीकडचे आहे हे त्यांनी मान्य केले..

उगाच नाही म्हंटले जात सत्य सनातन धर्म..🚩


गणेश चतुर्थीच्या सर्वांना शुभेच्छा.. 

गणपती बाप्पा मोर

 एकट्या जवाहरलाल नेहरूलाच बुद्धी दिली आहे असेही नाही. जवाहरलालपेक्षा बुद्धिमान अनेक आहेत. मी पाच वर्षे कॅबिनेटमध्ये होतो. पाच वर्षाचा मला अनुभव आहे. आठ दिवसातून एकवेळ मी काँग्रेसच्या बैठकीला हजर राहात असे. जवाहरलाल चांगले तोलून पाहिले आहेत. त्याचे डोके केवळ पोकळ भोपळ्याप्रमाणे आहे. त्यापलिकडे काही नाही. जवाहरलालचे नाक सरळ आहे. रंग गोरागोमटा आहे. म्हणून त्यास महत्त्व येत असेल तर गोष्ट वेगळी. पण अशी व्यक्ती शारदा नाटकात म्हटल्याप्रमाणे ' पाहिजे मुलीला सुंदर नवरा' या दृष्टीने उत्तम ठरेल. पण नेता बुद्धिमान पाहिजे, कणखर पाहिजे, तो देशाचे कार्य करणारा हवा असेल तर असे अनेक लोक सापडतील. पण तुम्हाला मात्र तोच पाहिजे ना ! विषयांतर झाले आणि काहींना ते अरुचकर वाटले तर त्यांनी क्षमा करावी. तुम्ही कदाचित मला मते देणार नाहीत. पण त्याची मला फिकीर नाही. मी चांगले ओळखतो की या देशाच्या जातीगत राजनीतीमध्ये आम्हाला कोणतेही स्थान नाही. राजकीय जीवन व्यतीत करता येत नाही, अशी स्थिती आहे. जीवनातील पाच वर्षे मी केंद्रिीय मंत्रीमंडळात काढली व दहा वर्षे केंद्रीय विधी मंत्रीमंडळात सदस्य म्हणून राहिलेलो आहे. आता मला पाहाण्यासारखे काही बाकी राहिले नाही. पूर्ण समाधान झाले आहे. राष्ट्राची हानी होऊ नये यासाठी हे सारे मी करतो. आज काँग्रेस सत्ताधारी आहे. ती तशीच पुढे सत्ताधारी राहिली तर या देशाला आग लागल्याशिवाय राहाणार नाही.

- बाबासाहेब आंबेडकर


प्रबुद्ध भारत-आंबेडकर बौद्ध दीक्षा विशेषांक 

२७ ऑक्टोबर १९५६

घालीन लोटांगण' या प्रार्थनेचे रहस्य तुम्हाला माहित आहे का ?


कोणत्याही देवाच्या आरती नंतर एका सुरात व धावत्या चालीत

 ही प्रार्थना म्हटली जाते. अतिशय श्रवणीय व नादमधुर असल्याने खूपच लोकप्रिय आहे. सर्वत्र म्हटली जाते व भक्त त्यात तल्लीन होऊन जातात.


आज आपण या प्रार्थने मधील वैशिष्टे पाहूया व त्याचा अर्थ समजावून घेऊ. ही प्रार्थना चार कडव्याची आहे व पाचवे कडवे हा एक मंत्र आहे.


वैशिष्ट्ये :

(१) प्रार्थनेतील चारही कडव्यांचे रचयिता  वेगवेगळे आहेत.

(२) ही चारही कडवी वेगवेगळ्या कालखंडात लिहिली गेली आहेत.

(३) पहिले कडवे मराठीत असून उरलेली कडवी संस्कृत भाषेत आहेत.

(४) बऱ्याच जणांना असे वाटते की ही गणपतीची प्रार्थना आहे. पण ही सर्व देवांच्या आरती नंतर म्हणली जाते.

(५) यातील एकही कडवे गणपतीला उद्देशून नाही.

(६) वेगवेगळ्या कवींची व वेगवेगळ्या कालखंडातील कडवी एकत्र करून ही प्रार्थना बनवली गेली आहे.


आता आपण प्रत्येक कडवे अर्थासह पाहूया

१) घालीन लोटांगण वंदीन चरणl डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझे | 

प्रेमे आलिंगन आनंदे पूजीन | 

भावे ओवाळीन म्हणे नामा |

वरील कडवे संत नामदेवांनी तेराव्या शतकात लिहिलेली एक सुंदर रचना आहे

अर्थ...

विठ्ठलाला उद्देशुन संत नामदेव म्हणतात, तुला मी लोटांगण घालीन व तुझ्या चरणांना वंदन करीन. माझ्या डोळ्यांनी तुझे रूप पाहिन एवढेच नाही तर तुला मी प्रेमाने आलिंगन देऊन अत्यंत मनोभावे तुला ओवाळीन.


२) त्वमेव माता च पिता त्वमेव | 

त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव | 

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव | 

त्वमेव सर्व मम देव देव |

हे कडवे आद्य शंकराचार्यांनी गुरुस्तोत्रात लिहिलेले आहे. ते संस्कृत मध्ये आहे. हे आठव्या शतकात लिहिले गेले आहे.

अर्थ.. 

तूच माझी माता व पिता आहेस. तूच माझा बंधू आणि मित्र आहेस. तूच माझे ज्ञान आणि धन आहेस. तूच माझे सर्वस्व आहेस.


(३) कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा | 

बुद्ध्यात्मना वा प्रकृती स्वभावात | करोमि यद्येत सकल परस्मै |

नारायणापि समर्पयामि ||

हे कडवे श्रीमद भागवत पुराणातील आहे. ते व्यासांनी लिहिलेले आहे.

अर्थ… 

श्रीकृष्णाला उद्देशून हे नारायणा, माझी काया व माझे बोलणे माझे मन, माझी इंद्रिये, माझी बुद्धी माझा स्वभाव आणि माझी प्रकृती यांनी जे काही कर्म मी करीत आहे ते सर्व मी तुला समर्पित करीत आहे.


(४) अच्युतम केशवम रामनारायणं | 

कृष्ण दामोदरम वासुदेवं हरी | 

श्रीधर माधवं गोपिकावल्लभं | 

जानकी नायक रामचंद्र भजे ||


वरील कडवे आदि शंकराचार्यांच्या अच्युताकष्ठम् मधील आहे. म्हणजेच आठव्या शतकातील आहे.

अर्थ… 

मी भजतो त्या अच्युताला, त्या केशवाला, त्या रामनारायणाला, त्या श्रीधराला, त्या माधवाला, त्या गोपिकावल्लभाला, त्या श्रीकृष्णाला आणि मी भजतो त्या जानकी नायक श्रीरामचंद्राला.


हरे राम हरे राम | 

राम राम हरे हरे | 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण | 

कृष्ण कृष्ण हरे हरे |

हा सोळा अक्षरी मंत्र 'कलीसंतरणं' या उपनिषदातील आहे. 

कलियुगाचा धर्म हे हरिनाम संकीर्तन आहे. याशिवाय कलियुगात कोणताच उपाय नाही. हा मंत्र श्री रामकृष्णाला समर्पित आहे.


अशी ही वेगवेगळ्या कवींची, वेगवेगळ्या भाषेचे मिश्रण असलेली प्रार्थना अत्यंत श्रवणीय आहे. तिचे नादमाधुर्य व चाल अलौकिक आहे. रचना कोणाची असो हे गाताना भक्त तल्लीन होतात व त्यांचा भाव देवा पर्यंत पोचतो.

कानोकानी ......

 "अहो, ऐकलंत का ?"

"काय झाले देवी ?"

"बघा ना, अहो आपल्या बाळाची तब्बेत बिघडली आहे. सगळे घरगुती उपचार केले पण काहीच फरक पडत नाही. कृपया, आपण आपल्या नेहमीच्या वैद्य ऋषींना पाचारण करता का ? पृथ्वीवरून परत आल्यापासून त्याला काय झालं आहे काहीच कळत नाही. माझ्या बाळाचे हाल मला बघवत नाहीत."

"पण देवी, बाळ गणेश जेव्हा पृथ्वीवरून आला तेव्हा ठीकच होता. म्हणजे आला त्या रात्री तिथल्या सगळ्या गमतीजमती कार्तिकेयला सांगत होता. मग अचानक असे काय झाले, की त्याची तब्बेत बिघडली ?"

"सांगते नंतर, आधी वैद्य ऋषींना बोलवा."

"ठिक आहे."


        महादेवांच्या आदेशान्वये एक गण वैद्यऋषींना घेऊन आला. वैद्य बाल गणेशाची नाडीपरिक्षा करतात. पण त्यांना काय वाटले कोण जाणे. देवी पार्वतीकडे त्यांनी गणेशाच्या प्रकृतीबद्दल विचारणा केली. 


"मुनीवर, काय झालं आहे काहीच कळत नाही. बाळ गणेश नीट सांगतही नाहीत. फक्त खूप त्रास होत आहे, एवढंच म्हणतोय. कुठे बाहेर जात नाही, नीट भोजन करत नाही, मोदकांकडे तर बघितले देखील नाही. आपल्या कक्षातून बाहेरच पडत नाही. आपणच विचारणा करावी."

"ठिक आहे". (गणेशाकडे पाहून) "बाळ गणेश, काय होत आहे तुम्हाला ? काय त्रास होतोय ?"

"मुनीवर, काय सांगू मला काय काय होतंय ते ! माझे ना मस्तक खूपच दुखतंय. अंग पण दुखतंय. माझे पोट दुखतंय, बहुतेक बिघडले आहे. मला झोप येत नाही. सारखं दचकून उठतो मी. कुठेही जावे असे वाटतच नाही. मलाच माझ्या तब्बेतीचे टेन्शन आले आहे. कृपया, काहीतरी उपचार करावा मुनीवर."

"बापरे, म्हणजे एकंदर परिस्थिती गंभीर आहे."


        महादेव आणि देवी पार्वती वैद्यऋषिंकडे पाहतात. देवी पार्वती तर घाबरून जाते. 


"ऋषिवर काय झाले आहे माझ्या बाळाला ?"

"माते, आपण कष्टी होऊ नये, सगळ काही नीट होईल."

(गणेशाकडे वळून)

"बाळ गणेश, मला सांगा तुम्ही गेले दहा दिवस पृथ्वीवर तुमच्या भक्तांच्या भेटीसाठी गेला होतात, तिथे दहा दिवस आपण काय काय केले, ते जरा सांगता का ?"

"हो, सांगतो ना"

"आपण मला इति वृत्तांत द्यावा, म्हणजे आपले उपचार करता येतील."

"होय मुनीवर. आईच्या सगळ्या सूचना नीट लक्षात ठेवून मी पृथ्वीवर गेलो होतो. माझ्या भक्तांनी खूप भक्तिभावाने माझे स्वागत केले. घराघरांतून मी फिरत होतो. माझ्या भक्तांनी माझ्यासाठी खूप काही केले होते. सुंदर आरास, मोदक, लाडू, धूप दीप आणि सुग्रास जेवणाचा सुगंध येत होता. पण खरं सांगू का, गेल्या काही वर्षांपासून जेवणाची चव बदलल्यासारखी वाटतेय."

"का बर ? आपणच म्हणालात की सुग्रास जेवण होते."

"हो तर, पण म्हणजे कसं आहे ना, बऱ्याच घरातून एक गोष्ट प्रकर्षाने जाणवली की, जुनी पिढी आता थकली आहे. त्यामुळे माझी सरबराई नव्या पिढीचे हाती. वाटलं होतं की, नाविन्यपूर्ण काही असेल, पण कितीतरी घरातून मला रेडिमेड मोदक खाऊ घातले. जेवण सुग्रास होते, पण त्यातील काही पदार्थ विकत घेतले होते त्यामुळे माऊलीचा मायेचा स्पर्श जाणवत नव्हता. पण माझ्या भक्तांनी प्रेमाने भारावलेला घास मी नाकारू शकत नव्हतो. जे जसे मिळाले तसे ग्रहण करावे लागले. पण त्यामुळे माझे पोट मात्र बिघडले आणि दुखू लागले. सार्वजनिक ठिकाणी तर मी भीतभीतच जात होतो. कारण तिथे मोठ्या आवाजात नुसत डिजे सुरू असायचा, ते मला अजिबात आवडत नाही. पण त्या लोकांना कळतही नाही ना. पण आता तर काही घरातून पण मोठ्यामोठ्याने गाणी लावली होती. ती ही चित्रपटातील. मला मुळीच आवडलं नाही. कुणी मला चक्रावर बसवलं, कुणी चंद्राच्या धारेवर, काहींनी एका पायावर उभं केलं, काहींनी तर मला दहा दिवस उभचं ठेवलं होतं हो. माझे अंग आणि पाय खूप दुखायला लागले आहे. उभ्या उभ्या जेवायला देखील होत नव्हत. अशाच परिस्थितीत कसेबसे दहा दिवस काढले. आणि परतीच्या प्रवासाला निघालो. पण खरं सांगतो, तो परतीचा प्रवास फारच अवघड होता. प्रिय भक्तांना सोडून माझाही पाय निघत नव्हता. जड अंतःकरणाने निघालो. कारण आई वडील वाट बघत होते ना. शिवाय कार्तिकेयचे पत्र आले होते, 'लवकर या' म्हणून. त्यामुळे निघालो. पण त्या परतीच्या प्रवासात अवस्था बिकट होती. साध्या टाळ मृदुंगाच्या गजरात मिरवणूक काढली असती आणि निरोप दिला असता, तर मला जास्त आनंद झाला असता. पण हे लोक पण असे असतात ना .... कधी सुधारणार कोण जाणे. ते काय ते बेंजो की काय असतं, ते कर्णकर्कश्य आवाजात वाजवत होते. बरं त्यावर निरोपाची गाणी देखील नव्हती."

"मग ?" (सर्वांनी आश्चर्याने विचारले)

"छे छे, कस सांगू ... अतिशय विचित्र गाणी. आता मला निरोप देताना ते मच गया शोर, खलीबली, मेहबूबा, अरे दिवानो , कोंबडी पळाली, झिंगाट ही असली आणि काहीबाही विचित्र  गाणी ... तुम्हाला सांगतो कानठळ्या बसवणारा आवाज होता. मी ओरडून सांगत होतो थांबायला, ते सगळ बंद करायला, पण सगळे नाचण्यात इतके दंग होते, की कुणाचे माझ्याकडे लक्षच नव्हते. जणू काही माझ्या जाण्याचा आनंद व्यक्त करत होते. त्या बेंजोच्या ओरडण्याने माझे कान दुखायला लागले आणि बंद झाले आहेत. कसाबसा इथे पोचलो. पण इथे आल्यावर आई, वडील, कार्तिकेय यांना पाहून खूप आनंद झाला. रात्रभर त्यांच्याशी बोलत होतो. झोप आली म्हणून झोपलो. पण झोपेतही त्या बेंजोचा थरकाप उडवणारा आवाज येतो, आणि मी दचकून जागा होतो." 

"प्रभू, जर बाळ गणेशाला इतका त्रास होत असेल, तर पुढच्या वर्षी आपण त्याला पृथ्वीवर पाठवू नये."

"नाही नाही, असं करता येणार नाही. आई, अग १०० पैकी किमान २०-२५ घरे असतात जिथे मनापासून माझ्यासाठी सगळ करतात. त्यांच्यासाठी तरी मला जावे लागणारच." 

"देवी, वर्षातून हे दहा दिवस बाळ गणेशाला पृथ्वीवर जावेच लागणार आहे. हा नियम तो कधीही मोडू शकत नाही. पृथ्वीवरील लोकांचा कितीही त्रास झाला, तरीही त्याला जावेच लागेल. आपण फक्त लोकांची मानसिकता बदलण्याची वाट बघायची."

"मुनीवर, कृपया आपण मला मी लवकर बरा होईन, असे औषध द्यावे. मला माझ्या लहान भावासोबत खेळायला जायचे आहे."


वैद्यऋषी गालातल्या गालात हसले. त्यांनी त्वरित एक मात्रा तयार करून तो द्रोण देवी पार्वतीच्या हाती दिला. 


"माते, ही मात्रा रात्री झोपताना आपण बाळ गणेश यांना द्यावी. ही मात्रा घेतल्यानंतर तीन दिवस ते शांतपणे झोपतील, आणि मग अगदी ठणठणीत बरे होतील. मात्र, ते झोपल्यावर त्यांच्या कक्षात कोणताही आवाज होणार नाही, याची काळजी अवश्य घ्यावी."


सर्वांनी मुनीवरांचे आभार मानले आणि ते गेल्यानंतर पुन्हा सगळे गणेशाभोवती बसले ....

पृथ्वीवरच्या गोष्टी ऐकायला ....


© शिल्पा देवळेकर ......

श्रीक्षेत्र नृसिंहवाडीतील विशेष कथा

वेदमूर्ती श्री भैरंभट जेरे

इसवी सन१४२२ ते१४३५ या बारा वर्षाच्या कालावधीतील ही कथा आहे. कृष्णा आणि पंचगंगा यांच्या संगमावरचे ते स्थान अत्यंत रमणीय होते. औदुंबर, शमी, वड, पिंपळ, बेल, पळस, चंदन, साल, देवदार, रुई, खैर अशा देव वृक्षांची तेथे दाटी होती. लोकवस्ती झालेली नव्हती. परंतु श्री रामचंद्र योगी आणि इतर काही महात्मे तपाचरणासाठी तेथे येऊन राहिले होते. कृष्णेच्या पूर्व तीरावर 'अमरापूर' (औरवाड) आणि त्याच्या दक्षिणेला अडीच तीन मैलावर 'अलास' अशी समृद्ध गावं वसलेली होती. वेदशास्त्रांचा अभ्यास असलेल्या ब्राह्मणांची बरीच घरे या दोन्ही गावात होती. पंचगंगेच्या पैलतीरावर 'कुरुंदवाड' नगरी आहे. संगम क्षेत्राच्या उत्तरेला तीन मैलावर 'शिरोळ' गाव आहे. देवधर्माच्या कामासाठी अलास, अमरापूर येथील  ब्रह्मवृंदांचे शिरोळ आणि कुरुंदवाड येथे नित्य येणे-जाणे असायचे.


अलासमध्ये श्री भैरंभट जेरे नावाचे एक वृद्ध ब्राह्मण राहत असत. ते वेदशास्त्र संपन्न आणि सदाचारी होते. त्यांची पत्नी अत्यंत शालीन आणि गुणवती होती. पती हाच देव, गुरु आणि सर्वकाही अशी तिची भावना होती. ती स्वतःचा आचारधर्म प्राणपणाने जपत असे. दोघे परस्परांवर नितांत प्रेम करीत असत. त्यांचे छोटे घर म्हणजे जणू मंदिरच वाटे. त्यांच्या घरी अतिथी अभ्यागतांचे यथोचित स्वागत होत असे. पण या वृद्ध दांपत्याला संतती नव्हती. त्यामुळे दोघेही एकमेकांची खूप काळजी घेत असत.


 पंचक्रोशीमध्ये श्री भैरंभटांना खूप मान होता. ते नेहमी अलास, अमरापूर, गोपूर (गौरवाड), शिरोळ, कुरुंदवाड येथे जोशकीसाठी जात असत. शिरोळला जाताना अमरापूर येथे अश्वत्थतळी असलेल्या श्रीअमरेश्वराचे दर्शन घेत असत. कृष्णानदीला जेथे उतार असेल तेथून पात्र ओलांडून पश्चिम तीरावर येत आणि पंचगंगेच्या काठाने शिरोळ ग्रामीण जात असत. पावसाळ्यात नावेतून नदी पार करावी लागे. गंगानुज नावाडी श्री भैरंभटांना आदराने पैलतीरी नेत असे. श्री भैरंभट सायंकाळी होण्यापूर्वी पुन्हा अलासला परत येत असत. वयाची सत्तरी ओलांडली तरी त्यांचा हा नित्यक्रम चालला होता.


एके दिवशी शिरोळला जाताना श्री भैरंभटजी नित्याप्रमाणे श्री अमरेश्वराच्या दर्शनासाठी थांबले. सकाळची वेळ होती. त्या दिवशी त्यांना कृष्णेच्या पश्चिम तीरावर संगमापासून जवळ असलेल्या एका औदुंबर वृक्षातळी एक संन्यासी बसलेले दिसले. त्यादिव्य मूर्तीला पाहून श्री भैरंभटाचे हात अभावितपणे जोडले गेले. नदी ओलांडून ते पश्चिम तीरावर आले. आता त्यांना जवळून यतीचे दर्शन झाले. त्या स्वामींनी भगवी वस्त्रे परिधान केली होती. त्यांच्या कंठात रुद्राक्षाच्या माळा होत्या. कपाळावर भस्माचे त्रिपुंड लावलेले होते. त्यांची कांती अत्यंत तेजस्वी होती. औदुंबराच्या तळवटी बसलेली ही दिव्यमूर्ती म्हणजेच प्रत्यक्ष श्रीनृसिंह सरस्वती दत्तप्रभूच होते.


श्री भैरंभटानी त्यांना साष्टांग नमस्कार केला. यती महाराजांनी केवळ 'नारायण' असा शब्द उच्चारला. मग श्री भैरंभट पुढे शिरोळला निघून गेले. आपली कामे आटोपून 'अलास' गावी परत जाताना त्यांनी यती राजांचे पुन्हा एकदा दर्शन घेतले. घरी आल्यावर पत्नीला यतिराजांचे दिव्यत्व वर्णन करून सांगितले. दुसऱ्या दिवशीही शिरोळला जाताना श्री भैरंभट आणि पुन्हा अमरेश्वराचे दर्शन घेतले आणि स्वामी महाराजांना वंदन करून येतानाही त्यांचे दर्शन घेतले. असे नित्य घडू लागले. जोशकीच्या कामाचे निमित्त होत जाऊन महाराजांच्या दर्शनाची ओढ वाटू लागली. श्रीगुरूंच्या 'नारायण' या प्रसन्न शब्दरवाव्यतिरिक्त इतर काही संभाषण होत नसे.


एकदा नित्याप्रमाणे श्री भैरंभट शिरोळ होऊन घरी परत येत असताना संगम स्थळी आले. संध्याकाळ झाली होती. यती महाराज सायंसंध्या करीत होते. श्री भैरंभटाने सुद्धा खांद्याची पडशी खाली ठेवली. भस्म धारण करून, कृष्णाप्रवाहकाठी बसून सायंसंध्या केली. यती महाराजांना नमस्कार केला. महाराजांनी 'नारायण: शब्द उच्चारला. पडशी खांद्याला लावून भैरंभट लगबगिने परत जायला निघाले. एव्हाना संध्याकाळ टळून गेली होती. अंधार दाटून आला होता. आज थोडा उशीरच झाला होता. घरी जाण्याची ओढ लागली होती. पण कधी नव्हे ते श्रीगुरुंनी संभाषण केले आणि त्यांना थांबवून घेतले. ते म्हणाले; "अंधार व्हायला लागला आहे. तुमचे वय बरेच झालेले दिसते. अशावेळी दुर्गम वाटेने रानावनातून एकट्याने जाणे बरे नव्हे. तेव्हा आज येथेच थांबावे, मुक्काम करावा. उजाडल्यावर स्वग्रही जावे !"


स्वामींचे बोलणे ऐकून श्री भैरंभटाच्या मनाची द्विधा अवस्था झाली. घरी त्यांची पत्नी एकटीच होती. 'नित्याप्रमाणे आपण घरी परतलो नाही तर तिला चिंता वाटेल, तिच्या मनाची तगमग होईल,' असे विचार त्यांच्या मनात येऊ लागले. पण या स्वामी महाराजांनी तर येथेच थांबण्याबद्दल सूचना केली आहे. ते तर ईश्वरी अवतारच वाटतात. त्यांची वाणी किती गोड आहे ! त्यांनी उच्चारलेला 'नारायण' हा शब्द मनाला सुखावून जातो. आज इतक्या वर्षांनंतर ते आपल्याशी बोलले. त्यांचा सहवास देव दुर्लभ वाटतो. 'त्यांचे वचन ओलांडून जाणे बरे नव्हे',  असा विचार करून श्री भैरंभट तेथेच थांबले. मग हात जोडून समोर विनम्र भावाने बसलेल्या श्री भैरंभटांची श्रीगुरु चौकशी करू लागले.


तेव्हा श्री भैरंभट म्हणाले, आम्ही अलास गावचे देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण. गोत्र भारद्वाज. माझे वडील वेदोनारायण होते. उपनयनानंतर त्यांच्याकडेच बारा वर्षे माझे शाखा अध्ययन झाले. आमच्या घरानजिकच श्री विश्वेश्वराचे मंदिर आहे.  त्याची स्थापना श्री मदाद्य शंकराचार्य स्वामी महाराजांनी केलेली आहे. तेथे माझ्याकडून नित्यपूजन आणि रुद्रपठण घडते. श्री जगदंबा एकविरा ही देखील आमची कुलदेवी आहे. नित्य तिचे ध्यानपूजन करतो. पंचक्रोशीतील लोक धर्मकृत्यासाठी पुरोहित म्हणून आदराने बोलवतात. माझी पत्नी सुशील व सदाचरणी आहे. आम्हाला अपत्य सुख लाभले नाही. आता आम्ही वृद्ध झालो आहोत. पत्नीने सुद्धा वयाची साठी ओलांडली आहे. आमची आर्थिक परिस्थिती बेताची आहे. पण एकविरा मातेच्या कृपेमुळे अन्नोदकाची कधी चिंता वाटली नाही. घरी अग्निहोत्र आहे. त्यामुळे तीर्थयात्रेला कधी गेलो नाही. पण आपले दर्शन झालेल्या दिवसापासून 'भरतखंडातील सर्व तीर्थ या ठिकाणी हात जोडून उभे आहेत असे वाटू लागले', आपला 'नारायण' हा शब्दरव ऐकून मनाला उभारी वाटते. प्रसन्न वाटते. म्हातारपण, व्याधी आणि मरणाचेही भय आता वाटत नाही  !"


श्रीगुरु त्रिकालज्ञानी होते. त्यांना हे सर्व ठाऊक होते. पण श्री भैरंभटांना उद्देशून ते म्हणाले, "आमच्याबद्दल एवढी श्रद्धा वाटते, मग येथेच या संगमावर राहायला या ना !" स्वामी महाराजांचे बोलणे ऐकताच श्री भैरंभट एकदम भांबावून गेले. श्री स्वामी महाराज अलौकिक, दैवी पुरुष आहे हे त्यांना कळले होते. पण त्यांच्या या सूचनेवर काय बोलावे हे कळेना. त्यांची ही अवस्था श्रीगुरुंनी ओळखली आणि ते म्हणाले, "या तपोभूमीत आम्हाला येऊन बारा वर्षे होत आली आहेत. आता आम्ही दुसऱ्या गावी जाणार आहोत. तथापि या स्थानाचा लौकिक येथून पुढे दिवसेंदिवस वाढणार आहे. येथे येणाऱ्या आर्त भक्तजनांचे मनोरथ पूर्ण करण्यासाठी पादुकांच्या रूपाने आम्ही येथे अखंड राहणार आहोत. त्या पादुकांचे नित्य पूजन-अर्चन करण्यासाठी एखादा वेदशास्त्र संपन्न सदाचारी ब्राह्मण असणे आवश्यक आहे. तुमचे आचरण  श्रध्दाभाव पाहून आम्ही प्रसन्न झालो आहोत. तेव्हा या कार्यासाठी तुम्हीच या ठिकाणी सहकुटुंब येऊन राहावे असे आम्हाला वाटते  !"


 श्रीस्वामी महाराजांचे ते बोलणे ऐकून श्री भैरंभट चांगलेच गांगरून गेले. येथे या निर्जन वनात राहायचे ? ना शेजार-पाजार ,ना लोकवस्ती. जवळच्या गावातून येणाऱ्या लोकांची क्वचित वर्दळ असते. त्यांना नदीपार करून  देणारे गंगानुज नावाडी. दिवसाची वेळ कशीतरी निघून जाईल. पण रात्रीच्या वेळी या वनात कसा निभाव लागायचा  ? उदरभरणसाठी काय करायचे ?आणि ही सगळी परिस्थिती स्वीकारून, श्रीगुरूंचे महात्म जाणून मी जरी येथे राहायला तयार झालो तरी पत्नीला ते जमेल का ? ती सुद्धा आता वृद्ध झाली आहे. दुखलेखूपले तर जवळपास ना कोणी वैद्य, ना कोणी आप्तेष्ट. रात्री अपरात्री जायचे कोठे ?आणि पावसाळ्यात काय करायचे ? तेव्हा तर कृष्णपंचगंगा या दोन्ही नद्या दुधडी भरून वाहत असतात. तेव्हा कोठे जायचे ? काय खायचे ? काय करायचे ? अशा अनेक विचारांचे काहूर श्री भैरंभटाच्या मनात निर्माण झाले. त्यांचे मन भयभीत झाले. थोडेसे धारिष्ट करून ते श्रीगुरुंना म्हणाले, "महाराज ; माझ्या जन्मोजन्मीचे भाग्य म्हणून श्रीगुरुपादुकांची सेवा करण्याची संधी मला मिळते आहे. पण या निर्जन ठिकाणी राहायचे तर त्याआधी पत्नीशी विचार विनिमय करावा असे मला वाटते. तिची जर तयारी असेल तर मोठ्या आनंदाने मी येथे राहायला येईन  !"  त्यांच्या या म्हणण्याला श्रीस्वामी महाराजांनी स्मिता वदनाने मान्यता दिली. थोड्याशा अपराधीपणाने आणि भारावलेल्या अंतकरणांनी श्री भैरंभट श्रीस्वामी महाराजांच्या समीप गेले. त्यांनी श्रीमहाराजांचे चरणयुगुल आपल्या दोन्ही हातांनी घट्ट पकडले आणि तशाच अवस्थेत त्यांचे थकलेले शरीर निद्रिस्त झाले.  ते पाहून आकाशातल्या देवाधिकांना सुद्धा श्री भैरंभटाचा हेवा वाटला.


इकडे आलास गावामध्ये श्री भैरंभटाची साध्वी पत्नी वाटेकडे डोळे लावून प्रतीक्षा करत होती. 'नेहमी सूर्यास्तापूर्वी घरी परतणारे पतीदेव आज काळोख झाला तरी अजून का आले नाहीत ?'  म्हणून तिला खूप काळजी वाटत होती. घरी अग्निहोत्र होते. पती परगावी गेली तर पत्नीने हवन यजन करावे असा संकेत आहे. त्याप्रमाणे यथाविधी कर्म करून ती पुन्हा वाट पाहू लागली. गावात, शेजारी-पाजारी निजानीज झाली. साध्वीच्या मनाची तगमग होऊ लागली. तिच्या आत-बाहेर येरझारा सुरू झाल्या. यांचे वय झाले आहे. आज काल त्यांना दगदग सोसत नाही. त्यात आज एकादशीचा उपवास. रस्त्यात कुठे चक्कर तर आली नसेल ना ? अंगावरच्या उपरण्याशिवाय त्यांच्या जवळ दुसरे पांघरूणसुद्धा नाही  !'असे विचार मनात चिंतेने तिचे मन घेरुन गेले.


मध्यरात्र होत आली. काय करावे ते सुचेना. शेवटी ती देवघरात येऊन बसली. देवघरातल्या एकविरा आईला हळदी कुंकू वाहिले आणि व्याकुळ मनाने प्रार्थना केली,  "माते; माझ्या जीवाची फार तगमग होते आहे बघ. निर्जन वाटेवर यांना कसले संकट तर आले नसेल ना ? आता तूच त्यांचे रक्षण कर ! तू आमची कुलदेवता आहेस. आमचे रक्षण करण्याची जबाबदारी सर्वस्वी तुझीच आहे  !" मोठ्या तळमळीने अशी प्रार्थना करता करता त्या साध्वीला ग्लानी आली. ती देवघरातच पडून राहिली. त्या अवस्थेतच प्रत्यक्ष एकविरा माता तिच्यासमोर प्रकटली. प्रसन्न मुद्रा, कपाळावर कुंकुम तिलक, नाजूक गळ्यामध्ये सुवर्ण मंगळसूत्र, पायात रुणझुण वाजणारी नुपुरे, तेजस्वी रूप; अशी आदिमाताच समोर प्रकटली आणि म्हणाली,  "हे साध्वी; तू मुळीच चिंता करू नकोस. कृष्णा-पंचगंगेच्या संगमतीरावर भगवान श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांच्या सानिध्यात तुझे सौभाग्य सुरक्षित आहे. तुम्हा उभयतांचा आचार आणि श्रद्धा यामुळे श्रीगुरु तुमच्यावर प्रसन्न झाले आहेत. तुमच्यावर आता त्यांची कृपा व्हायची आहे.  मी स्वतः तुझ्या सोबतीला आले आहे. मुळीच घाबरू नकोस  !" देवीचे असे मंजुळ शब्द ऐकून साध्वी सुखावत होती. त्या अवस्थेत तिला संगमावरचे दृश्य दिसू लागले. यतिमहाराजांच्या चरणांशी श्री भैरंभट गाढ झोपले होते.


हे अनुपम दृश्य पाहता पाहता किती वेळ गेला ते तिला समजलेच नाही; पण जाग आली तेव्हा पहाट झाली होती. तिचे शरीर रोमांचित झाले होते. भगवती श्रीएकविरा देवी आणि संगमावरील यतिराजांचे रूप तिला पुन्हा पुन्हा आठवत होते. मोठ्या उल्हासित मनाने भैरंभटपत्नीने सडासंमार्जन केले. देवघरातील दिव्याची तेलवात नीट केली. घरात एक सुगंध भरून राहिला होता. परसदारीचे प्राजक्त, सोनचाफा, जाई जुईचे वेल, कृष्णकमळ आज फुलांनी अंगोपांग डवरून गेले होते.


इकडे संगमतीरावर ब्राह्म मुहूर्तावर श्रीस्वामी महाराजांनी प्रातःस्नानासाठी चालले होते. श्री भैरंभटही जागे झाले. श्रीस्वामी महाराजांच्या मागोमाग ते ही जाऊ लागले. मुखपृक्षालन आणि देहशुद्धी करुन ते कृष्णेच्या प्रवाहात उतरले. श्रीगुरूंच्या अंगावरून येणाऱ्या जलप्रवाहात ते स्नान करू लागले. श्रीगुरुंनी त्यांच्याकडे कौतुकाने पाहिले. स्नानानंतर भैरंभटानी अंगावरचे उपरणे घट्ट पिळून घेतले. त्यांचे संध्या वंदन झाले. गुरुमाऊली पर्णकुटीकडे आली होती. जाण्याची आज्ञा घेतली आणि परतीचा रस्ता धरला. मंद वाऱ्याने त्यांच्या अंगावरची वस्त्रे सुकत होती.


आता सूर्योदय झाला. श्री भैरंभट घरी पोहोचले. रात्रभर प्रतीक्षा करणारी  पत्नी त्यांच्या आगमनाने आनंदी झाली. दोघांनी एकमेकांकडे पाहिले. दोघांनाही आपले दिव्य अनुभव परस्परांना सांगायचे होते. पण त्या अनुभव विश्वात रमलेले मन अजूनही बाहेर येत नव्हते. कितीतरी मोठे निधान गवसल्याचा आनंद दोघांच्याही चेहऱ्यावर विलसत होता. मूक संवादातच थोडा वेळ निघून गेला. हातपाय धुवून श्री भैरंभट खांबाला टेकून बसले. फुलपात्र भरून कढत दूध पत्नीने त्यांना प्यायला दिले. दूध पिता पिता श्री भैरंभटानी पत्नीला  विचारले, "काल रात्री यतीवर्यानी मला संगम स्थानावर त्यांच्या आश्रमात ठेवून घेतले. तुम्हाला खूप चिंता वाटली असेल ना मी परतलो नाही म्हणून  ?" त्यावर पत्नी म्हणाली, "मला सगळे ठाऊक आहे. मला येथे कसलाही त्रास झाला नाही आणि चिंताही वाटली नाही. आपण या सगळ्या गोष्टी भोजनानंतर बोलू. आता तुमची आन्हिके आधी आटोपून घ्या  !"


पत्नीचे बोलणे ऐकून श्री भैरंभट थोडे चकितच झाले; पण ते जास्त काही बोलले नाहीत. त्यांनी पुन्हा एकदा स्नान करून पूजा केली. पूजेच्या प्रत्येक उपचाराच्या वेळी श्री स्वामी महाराजांची दिव्य छबी त्यांच्या डोळ्यासमोर येत होती. यथाविधी पूजनाबरोबर श्रीसूक्त, रुद्र, पवमान पंचसूक्त पाठ झाले व विश्वदेव झाला. तोपर्यंत गृहस्वामिनीने पाकसिद्धी केली होती. देवांना नैवेद्य दाखवून झाला. गोग्रास काकबळी देऊन झाला. नित्याप्रमाणे कोणी अतिथी येताहेत का, ते पाहण्यासाठी श्री भैरंभट दारात येऊन उभे राहिले. त्यांना एक जटाधारी योगी पुरुष येताना दिसले. त्यांना सामोरे जाऊन घरी येण्याबद्दल विनंती केली. योगीराजांनी ती मान्य केली. श्री भैरंभटानी आपल्या पत्नीला हाक मारली. पाण्याने भरलेली कळशी घेऊन ती बाहेर आली. मुनिवर्यानी हस्त-पाद प्रक्षालन केले. मध्यान्ह स्नानही केले. त्यांच्या आगमनाने दोघेही सुखावले. केळीच्या दोन पानांवर भैरंभटपत्नीने शाकपाकादी सुग्रास अन्न वाढले. प्रोक्षण करून श्री भैरंभटजींनी योगीराजांना अन्नग्रहण करण्याची प्रार्थना केली. जगताचे भरण पोषण करणारे श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज वेश पालटून श्री भैरंभटजिंकडे आले होते. भैरंभट पत्नीने वाढलेले अन्न मोठ्या ऋचीने ग्रहण करत होते. धन्य ते भैरंभटजी आणि धन्य ती त्यांची साध्वी पत्नी  !


भोजनानंतर श्री भैरवभटांनी पडवीमध्ये योगीराजांसाठी दर्भाची चटई पसरून दिली आणि त्यांना वामकुक्षी करण्याची विनंती केली. योगीराजांनी ती मान्य केली. थोड्यावेळात ते निद्रिस्त झाले. साध्वीचे ही भोजन झाले. दोघेही मध्यघरात बसून हळूहळू आवाजात बोलू लागले. श्री भैरंभट संगमावरच्या श्री स्वामी महाराजांचे वर्णन करीत होते. त्यांनी आपणास तेथे मुक्कामी का बसवून घेतले होते ते सांगितले. ते म्हणाले, "ते यतीराज म्हणजे प्रत्यक्ष श्री दत्तात्रेयप्रभू आहेत. भक्तांच्या उद्धारासाठी त्यांना आता दुसऱ्या ठिकाणी जायचे आहे. पण मनोहर मनोहर पादुकांच्यारूपाने ते संगमावर राहणार आहेत. त्या पादुकांची पूजा अर्चा करण्याची जबाबदारी आपणावर येणार आहे. त्याबद्दल आपण उभयतांनी विचारविनिमय करून निर्णय घ्यायचा आहे  !"


त्यानंतर भैरंभट पत्नीने आपला रात्रीचा दिव्य अनुभव सांगितला की, "काल रात्री कुलदेवता एकविरा मातेने प्रत्यक्ष दर्शन देऊन मला अभय दिले. एवढेच नव्हे तर रात्रभर माता माझ्या सोबतीला सुद्धा राहिली होती. तिने मला संगमावरच्या यतीराजांचे दर्शन सुद्धा घडवले. त्यांच्या चरणांपाशी तुम्ही निद्रिस्त असल्याचे मी पाहिले. स्वामींची आज्ञा आपण मान्य करायला हवी. त्या पण त्या निर्जन ठिकाणी आपला निभाव कसा लागायचा  ? आपण दोघेही आता वृद्ध झालो आहोत. काळजी घ्यायला अपत्य नाही. इतर कोणा कोणाची घरे नाहीत घरे सुद्धा नाहीत. तुम्ही दिवसभर उद्योगासाठी गेला तर मी एकटीने तेथे काय करायचे. एखादे श्वापद, चोर, धटिंगण आले ? तर माझे मन तिकडे मुक्कामी राहायला धजत नाही  !"


दोघेही विचारात पडले. श्रीगुरुंची आज्ञा उल्लंघू नये असे वाटत होते. पण संभ्रम झाला होता. शेवटी, 'घरी आलेल्या मुनिवाऱ्यांना विचारून निर्णय घ्यावा', असे दोघांनी ठरवले. योगीराजांची वामकुक्षी झाली होती. पडवीच्या बाहेर येऊन त्यांनी चुळा भरल्या आणि ते पुन्हा असनावर येऊन बसले. ते पाहून भैरंभट पती-पत्नी बाहेर आले. मुनिवर्याना नमस्कार करून भैरंभट नम्र स्वरात म्हणाले, "महाराज; एक विचारायचे आहे  !" तेव्हा महाराज म्हणाले, "नीसंकोच विचारा !" श्री भैरंभटांनी काल संध्याकाळपासून घडलेली सर्व हकीकत त्यांना तपशीलाने सांगितली. ते ऐकून योगीराज म्हणाले,  "संगमावरचे ते संन्यासी म्हणजे प्रत्यक्ष श्री दत्तात्रेयप्रभूच आहेत. जन्मोजन्मीचे तुमचे सुकृत म्हणून  त्यांच्या सेवेचा तुम्हाला लाभ होणार आहे. मनामध्ये कसलेही भय, किंतु न बाळगता लागलीच दोघेही तेथे राहावे राहण्यास जावे. त्यांच्या इच्छेप्रमाणे मनोहर पादुकांचे पूजन-अर्चन करण्यास आरंभ करावा. तुमची सर्व संकटे निवारण्यास ते समर्थ आहेत. तुमचा योगक्षेमही ते चालवणार आहेत. ते तुमच्यावर प्रसन्न आहेत !" ते ऐकून दोघांनाही दिलासा मिळाला. त्यांनी मुनीवर्याना वंदन केले. आशीर्वाद देऊन तापसी निघून गेले.


कृष्णा पंचगंगा संगमावर राहायला जाण्याचा उभयतांचा निश्चय पक्का झाला. अलास गावातील इतर ग्रामस्थांनाही श्रीगुरुरायांची महती आत्तापर्यंत समजली होती. श्री भैरंभटांनी आपला निर्णय नातेवाईक, भाऊबंद आणि शेजाऱ्यांना सांगितला. गावामध्ये त्यांना लोक खूप मान देत असत. या उतारावयात गाव सोडून ते निर्जन ठिकाणी जाणार म्हणून काहींनी काळजी व्यक्त केली. पण अनुभवी वृद्ध लोकांनी भैरंभट दांपत्यावर परमेश्वराची कृपा होत असल्याचे जाणले. अशा लोकांनी त्यांना मनोमन पाठिंबा दिला. श्री भैरंभटांची थोरवी त्यांना कळली होती. 'प्रत्यक्ष भगवती एकविरा भैरंभटपत्नीच्या सोबतीसाठी येऊन राहिली', हे कानोकानी लोकांना कळले होते.


श्री भैरंभटांचे घर अजूनही त्या प्रसन्न सुगंधाने भरून राहिले होते. साक्षात कुलदेवताच रक्षण करणारी असल्यावर कुठेही राहिले तरी भय कशाचे  ? दोघांच्याही मनाची बुद्धीची अशी तयारी होत होती. ग्रामस्थ, बंधूजन आणि नातेवाईकांची ही या दैविक कार्याला अनुकूलता झाली होती.


वर्षा ऋतु संपला. अश्विनातले नवरात्र पार पडले.  पौर्णिमा झाली. वातावरण मोठे प्रसन्न होते. अश्विन वद्य  दशमीला पहाटे उठून दोघांनीही आन्हिक आटोपले. पूजाअर्चा, वैश्वदेव, नैवेद्य झाले. एव्हाना मध्यान्ह होऊन गेली. आता संगमाकडे वास्तव्यासाठी प्रयाण करायचे होते. भोजनोत्तर पुन्हा एकदा देवतांचे दर्शन घेतले. या दाम्पत्याला निरोप देण्यासाठी सगळे आप्तसकीय जमले होते. भैरंभटपत्नीने काही शिधासामुग्री, थोडी भांडीकुंडी, नित्याची वस्त्र प्रावरणे, अंथरूण, पांघरून असे गरजेचे साहित्य सोबतीला घेतले. यतीमहाराजांच्या प्रत्यक्ष दर्शनाच्या वेळी अर्पण करण्यासाठी काही फळे सुद्धा घेतली. इतर जनांनी सुद्धा फळे, दूध, शिधा आणून दिले. उभयतांनी राहत्या वास्तूचे मनोभावे दर्शन घेतले. ती एका बांधवांच्या स्वाधीन केली. पाठमोरे झाले आणि अमृत अमरापूरच्या दिशेने चालू लागले.


काही लोक त्यांना वेशीपर्यंत पोहोचवायला आले. त्या वृद्ध दांपत्याला सामानाचे ओझे होऊ नये म्हणून काही जवळची मंडळी संगमस्थानापर्यंत त्यांना पोहोचवायला निघाली. मार्गामध्ये शुभ शकुन होत होते. शुभ्र गाईंना बिलगुन स्तनपान करणारी वासरे दिसली. चातक, भारद्वाज पक्षांचा मधुर ध्वनी कानी येऊ लागला. भरलेले कलश घेतलेल्या सुवासिनी मार्गात आल्या. मुंगुसाचे एक युगुल वाटेमध्ये दिसले. मोठ्या प्रसन्न चित्ताने मंडळी अमरापूरला पोहोचली. तिथे अश्वत्थातळी असलेल्या श्री अमरेश्वर लिंगाचे दर्शन घेतले. श्रीगुरूंचा अनुग्रह झालेला गंगानूज नावादी आपली नौका घेऊन पूर्वकिरावर थांबला होता. श्री कृष्णावेणी मातेला वंदन करून सर्वजण त्यामध्ये बसले. पश्चिम तीरावर औदुंबर वृक्षातळी पर्णकुटी मध्ये श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज बसले होते. त्यांचे दुरूनच दर्शन होता क्षणी भैरंभट पती-पत्नीच्या मनात अष्टसात्विक भाव दाटून आले.


जवळ आल्यानंतर श्री भैरंभटानी श्री स्वामी महाराजांना साष्टांग प्रणीपात केला. श्रीगुरुरायांनी त्यांच्या मस्तकावर हात ठेवून आशीर्वाद दिला. भैरंभटाच्या पत्नीने सुद्धा यतीमहाराजांना वाकून नमस्कार केला. श्रीस्वामी महाराजांनी त्यांच्या ओटीत श्रीफळ घातले आणि आशीर्वाद दिला. "अखंड सौभाग्यवती भव ! पुत्रवती भव !" त्या दिव्य मूर्तीच्या दर्शनाने दोघेही भारावून गेले. परंतु ते आशीर्वाचन ऐकून थोड्याशा धीटाइने पण नम्र स्वरात साध्वी म्हणाली, "महाराज; माझी आता साठी उलटली आहे. यांना सुद्धा चौऱ्याएंशी वर्षे पूर्ण झाली आहेत. आता या वयात, या जन्मात आम्हाला पुत्रप्राप्ती कशी व्हावी  ?" यावर श्री गुरु हसून म्हणाले, "आमचा आशीर्वाद याच जन्मात फलद्रुप होणार आहे. तुम्हाला आता लवकर एक उत्तम पुत्र होईल. त्याला पुढे चार पुत्र होतील. त्या चारही पुत्रांचे वंश औदुंबराला ज्याप्रमाणे फळे येतात, त्याप्रमाणे वाढतील. आता येथे एका शिळेवर पादुका प्रकट होतील. त्या पादुकांचे तुम्ही आणि तुमच्या वंशाज्यांनी सूर्य चंद्र असेपर्यंत पिढ्यानपिढ्या पूजन करावे. येथे आमचे बारा वर्षे वास्तव्य झाले. आता आम्हाला गंधर्व नगरी (गाणगापूर) येथे जायचे आहे. परंतु या मनोहर पादुकांच्या रूपाने या ठिकाणी आमचे वास्तव्य अखंड राहणार आहे. याची तुम्हाला वारंवार प्रचिती येईल. या क्षेत्राचा लौकिक वाढेल. भक्तांच्या मनोकामना पूर्ण होत राहतील  !"


एवढे बोलून श्री स्वामी महाराजांनी औदुंबर वृक्षाच्या बुंध्यालगत असलेल्या एका काळ्या पाषाणावर कमंडलुतील कृष्णाजल शिंपडले. स्वतः हाताने तो पाषाण धुवून स्वच्छ पुसला. त्यावर बोटाने ओंकाराची (प्रणवाची) आकृती रेखली. आणि त्याच अंगुलीने मानवी पावलांच्या दोन मुद्रा रेखल्या. त्यांच्या सभोवती शंख,चक्र,गदा, पद्म, जंबुफळ अशी स्वस्ती चिन्हे ही रेखाली. बघता बघता त्या शिळेवर या शुभ चिन्हांसह मनोहर पदयुगुल प्रकट झाले. ते पाहून भैरंभट दांपत्य आणि सोबत आलेल्या आप्तेष्टांचे अंत:करण भाव विभोर झाले. सगळ्यांच्या नेत्रातून घळघळा आनंदाचे अश्रू येऊ लागले. श्री स्वामी महाराजांना आणि त्या मनोहर पादुकांना पुन:पुन्हा वंदन केले. ते सर्वजण एका दिव्य प्रसंगाचे साक्षी झाले होते.


त्या तेजस्वी पादुका आणि श्री स्वामी महाराजांची दिव्यमूर्ती यांच्याकडे पाहता पाहता थोडा वेळ सगळ्यांचेच भान हरपले. काही वेळाने श्रीगुरु श्री भैरंभटांना म्हणाले, "आता तुमच्याजवळ असलेली सर्व शिधासामुग्री या पादुकांपुढे ठेवा. साक्षात् अन्नपूर्णा त्यामध्ये अवरणार आहे. तिचे पूजन करा. केवळ तुम्हालाच नव्हे तर तुमच्या पुत्रपौत्रादी वंशाज्यांना, या क्षेत्री राहणाऱ्या ग्रामस्थांना आणि भक्त जनांना यापुढे अन्न आणि उदकाची चिंता राहणार नाही !" श्री भैरंभटाने आणि इतरांनी आणलेला सर्व शिधा एका वस्त्रावर मांडून तो पादुकांसन्मुख ठेवला. श्रीमहाराजांच्या सांगण्याप्रमाणे अन्नपूर्णेचे पूजा पूजन केले आणि प्रार्थना केली. 


अन्नपूर्णे सदा पूर्ण शंकरप्राणवल्लभे 

ज्ञानवैराग्य सिद्धार्थ भिक्षां देही च पार्वती||


अश्विन वैद्य दशमीच्या त्या संध्याकाळी, मनोहर पादुकांच्या समोर प्रत्यक्ष अन्नपूर्णा प्रतिष्ठित झाली. सर्वांनी अन्नपूर्णा माता, मनोहर पादुका आणि श्रीगुरुरायांना साष्टांग प्रणिपात केला. एक अनामिक सुगंध सगळीकडे दरवळत होता. आप्तेष्टांनी श्री भैरंभटांना त्या आश्रम परिसरात एक पर्णकुटी उभा करून दिली. तिथे त्यांचे साहित्य मांडले. आता दिवस मावळतिकडे चालला होता. गावकरी परत जायला निघाले. उदईक अश्विन वद्य एकादशी होती. द्वादशीला श्रींच्या मनोहर पादुकांची महापूजा करण्याचे सर्वांनी ठरवले. "त्यासाठी सर्वांनी थोडे लवकरच यावे  !" अशी श्री भैरंभटांनी विनंती केली.


एकादशीच्या दिवशी भैरंभट दांपत्य नित्याप्रमाणे पहाटेसच उठले. शरीरशुद्धी झाली. यतीमहाराज श्रीकृष्ण स्नानासाठी चालले होते. श्री भैरंभटही त्यांच्या मागोमाग जाऊ लागले. भैरंभट पत्नीने औदुंबर तळवटीच्या पादुकांसमोरील परिसर झाडलोट करून स्वच्छ केला. सडासंमार्जन करून रांगोळी घातली. हे करत असताना तिला आश्रमाच्या परिसरात आणखी कोणाचा तरी अदृश्य वावर असल्याचे जाणवत होते.  सर्व परिसर अतिशय जलदपणे स्वच्छ करून तेथे मांगल्याची प्रखरण होत होती.


थोड्याशा भीतीने आणि विस्मयाने साध्वीने चहू बाजूस पाहिले. तिला अनेक दिव्य स्त्रिया तेथे वावरत असताना दिसल्या. त्या स्त्रिया भैरंभटपत्नीचे कुतूहल दूर करण्यासाठी तिच्यासमोर येऊन उभ्या ठाकल्या. त्या देवींना साध्वीने वंदन केले. त्या ६४ योगींनी होत्या. काशी क्षेत्रातल्या मनकर्णिका घाटावरच्या त्या दिव्यांगना श्रीस्वामी महाराजांच्या सेवेसाठी संगम क्षेत्री आल्या होत्या. पूर्व तीरावरील अमरेश्वरासन्निध त्यांचा निवास होता. ब्राह्ममुहूर्ता पासून रात्री शेजारती पर्यंत त्या श्रीस्वामी महाराजांची सेवा करत असत. स्वतः अन्नपूर्णा माता श्रीमहाराजांना भिक्षा देत असे.


इकडे श्रीस्वामी महाराजांचे कृष्णेमध्ये स्नान चालले होते. सुवर्ण कुंभामध्ये जल घेऊन ६४ योगिनी महाराजांना स्नान घालित होत्या. विस्मयाने तो प्रकार पहात स्वामींच्या अंगावरून येणाऱ्या जलप्रवाहात श्री भैरंभटाने स्नान केले. त्यांना स्वामींच्या अधिक जवळ जाण्याचे धारिष्ट झाले नाही. पर्णकुटीमध्ये परतून संध्यादि कर्मे झाली. एव्हाना सूर्योदय झाला होता. श्री भैरंभटानी पादुकांसमोर बसून यथामिलित उपचारांनी पूजन केले. कृष्णाजलाने स्नान घालून पादुका स्वच्छ कोरड्या केल्या. गंध, फुल वाहिले. यथाविधी धूपदीप दाखवून फळांचा नैवेद्य अर्पण केला. श्रीस्वामी महाराज तेथेच बसले होते. सूर्याच्या कोळ्या किरणांनी त्यांची कांती अधिकच तेजस्वी दिसत होती. पुरुषसूक्त, श्रीसूक्त, रुद्र, पंचसूक्त पवमान यांचे भैरंभटाने गंभीर आवाजात पठण केले. एकादशीचा तो दिवस महाराजांच्या जवळ बसून विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र, श्रीमद् भगवद्गीता, ब्राह्मणस्पती सूक्त ,विष्णू सूक्तेय, ऐतरेय उपनिषद, शांतीपाठ यांची आवर्तने करण्यात व्यतीत झाला


श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज या तपोवनात वास्तव्याला येणार हे कळल्यावरून श्री रामचंद्र योगी महाराज आधीपासूनच तेथे येऊन तपाचरण करत होते. त्या वृद्ध ब्राह्मणाप्रती असलेला श्री महाराजांचा वात्सल्य भाव आणि पादुकांचे प्रकटीकरण यांनी वनातले सर्व तापसी विस्मित झाले होते. कठोर तपस्या करून सुद्धा जो लाभत नाही तो हा 'सच्चिदानंद ठेवा' वृद्ध भैरंभटांना केवळ असीम श्रद्धेने मिळाला होता. श्रीरामचंद्र योगीराजांनी श्री भैरंभटांना श्री दत्तात्रयांचे प्रथम अवतार भगवान श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी महाराज आणि दुसरे अवतार श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज यांचे महात्म्य वर्णन करून सांगितले. "या मनोहर पादुका म्हणजे श्री दत्तात्रेयप्रभू, श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी महाराज आणि श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज यांचे विशेष रूप आहे  !" असेही त्यांनी सांगितले.


दिवसभरातील नवलाईच्या घटनांचे स्मरण करीत पती-पत्नी आपल्या कुटीमध्ये झोपी गेले. अश्विन वाद्य द्वादशीचा ब्रह्म प्रहर झाला दोघे जागे झाले. देहशुद्धी झाली. त्या रम्य देवप्रहरी अवघे आकाश चांदण्यांनी फुले होते. एखाद्या मंगल कार्याची घाई झाल्याप्रमाणे प्रत्यक्ष उमा त्या नभंगणातून वेगाने संचार करीत होती. अशा प्रसंगी एखादी आई ज्याप्रमाणे आपल्या बाळाला नटवते, सजवते त्याप्रमाणे सर्व नक्षत्रे आणि तारकांना ती विशेष तेजवलय देऊन सजवीत होती. या अपूर्व दृष्टीने आणि शीतल प्रकाशाने भैरंभट युगुल सुखावले होते.


त्या नक्षत्रमंडपा खालून श्रींची स्वारी कृष्णा स्नानासाठी निघाली होती. श्री भैरंभट ही लगभगिने त्यांच्या मागोमाग जाऊ लागले. नित्याप्रमाणे ६४ योगिनींनी आश्रम परिसर लखलखित केला होता. भैरंभटपत्नीने श्रींच्या पादुकांसमोरील अंगणात सडासंमार्जन करून रांगोळ्या घातल्या. तिथे आता अवघे मांगल्ये उभे राहिले. नक्षत्रतेजाने चमचमणाऱ्या जलप्रवाहात श्री स्वामी महाराज उतरले. त्यांच्या अंगावरून येणाऱ्या जलामध्ये श्री भैरंभटांनी ही स्नान केले. तोपर्यंत भैरंभट पत्नी सुद्धा तेथे आली. तिनेही मंगल स्नान केले. उभयता मग श्रीगुरूंच्या थोडे जवळ आले. श्री स्वामी महाराजांना स्नान घालण्याचा तयारीत असलेल्या ६४ योगींनी थोड्या बाजूला झाल्या. कृष्णाजलाने भरलेले सुवर्णकलश त्यांनी दांपत्याच्या हाती दिले. उभयतांनी मग श्रीगुरुंच्या रूपातील प्रत्यक्ष चंद्रमौळी गंगाधरास मोठ्या शरण भावाने स्नान घातले. भैरंभट  पती-पत्नींनी केलेला तो पहिला जलाभिषेक होता.  हा रम्य सोहळा पाहण्यासाठी देव देवतांनी आकाशात गर्दी केली. अवघा आसामंत म्हणतात स्वर्गीय सुगंधाने पुलकित झाला.


श्रीगुरूंचे स्नान झाले. कृष्णाजलाने भरलेला त्यांचा कमांडलू आणि दंड घेऊन भैरंभट पुढे आले. पाठोपाठ यतीराजही आले आणि आश्रमात आसनस्थ झाले. एव्हाना पूर्वेला अरुणरथावर सोन्याचा ध्वज फडकू लागला. सनक, सुनंदन, देवल, पार्षद, आणि स्वर्गस्थ ऋषीमुनींनी पक्षांची रूपे धारण केली होती. कोवळ्या रवी किरणांच्या हिंदोळ्यांवरून झेपावत आश्रम परिसरातील वृक्षराजींवर स्थान मिळवण्यासाठी जणू त्यांची स्पर्धा चालली होती. त्यांच्या किलबिलाटातून जणू कृत्रिम श्रुती मंत्रांची आवर्तने घडत होती. मयुरांचे केकारव; भारद्वाज, हंस, चातकांचे मधुर ध्वनी यांनी आश्रम परिसर भरून गेला होता. इकडे अलास, अमरापूर, गोपूर, गौरवाड या गावांमध्ये आप्तस्वकीय इष्टमित्र व इतर भाविक जण घरची कामे लवकर आटोपून संगम स्थानाकडे यायला निघाले होते. दूध, दही, तूप, मध यांचे कलर त्यांनी सोबत घेतले होते. काही जणांनी साखर तर काही जणांनी फळे घेतली होती. काही बांधवांनी भैरंभट दाम्पत्यांसाठी वस्त्रे, पात्रे, प्रावरणे आणली होती. आज श्रींच्या मनोहर पादुकांची पहिली महापूजा व्हायची होती. सगळी मंडळी संगम क्षेत्री पोहोचेपर्यंत उन्हे वर आली होती. सर्वांनी श्रीगुरुंना आणि दिव्य मनोहर पादुकांना साष्टांग प्रणिपात केला. यामध्ये अनेक थोर वैदिक याज्ञीक, पुराणिक होते. सर्वजण श्रीस्वामी महाराजांच्या समोर बसले. श्रीस्वामी महाराजांनी श्री भैरंभटांना पादुकांचे पूजा विधान सांगितले.


विधिवत पुण्याहवाचन आणि नांदी श्राद्ध झाले. स्थळ, काळ, संवत्सर, अयन, ऋतू, महिना, तिथी, वार, नक्षत्र, योगकरण यांचा उच्चार करून, श्री दत्तात्रेय प्रभू भगवान श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी महाराज व भगवान श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांच्या पादुकांच्या पूजनाचा संकल्प सोडला. या पूजनाने श्रुतीस्मृती ,पुराणोक्त फळ मिळावे; सहकुटुंब सहपरिवार आरोग्य ऐश्वर्य यांची अभिवृद्धी व्हावी सकल दुरितांचे शमन व्हावे, वंशवृद्धी व्हावी आणि  सकल कल्याण व्हावे; अशी कामना सुद्धा व्यक्त केली.


श्री महागणपती पूजन करून कलश, घंटा, शंख आणि दीप यांचे पूजन केले. शोडषोपचारे पूजा आरंभिली. श्रींच्या पादुकांवर दृष्टी ठेवून आवाहनाचा मंत्र म्हटला. तेथे पादुकास्थानी प्रत्यक्ष श्रीगुरु दिसू लागले. आसनासाठी अक्षता अर्पण केल्या. त्या श्रीगुरूंच्या चरणांवर दिसू लागल्या. श्रींच्या पादुकांवर पाद्यपूजा पूजनासाठी जल अर्पण केले ते सुद्धा महाराजांच्या चरणांवर दिसले. अशा प्रत्येक उपचारांगणित श्रीनृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज आणि त्यांनी प्रकटविलेल्या मनोहर पादुकांचे अभिन्नत्व दिसू लागले. या मनोहर पादुकांच्या रूपाने प्रत्यक्ष श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज तेथे अधिष्ठित असल्याची सर्वांना खात्री पटली.


श्री भैरंभटांनी श्रीस्वामी महाराजांना आचमन आणि मधुपर्क देऊन श्रीपादकांना कृष्णेच्या शीतल जलाने स्नान घातले. त्यानंतर स्वर्गीय धेनूचे दूध, दही, तूप तसेच मध आणि शर्करा अशा पंचामृताने स्नान घातले. शुद्धोधक आणि गंधोधक-स्नानानंतर पूर्वनिर्माल्य विसर्जित केले. रुद्र, पुरुषसूक्त, श्री सूक्त, पंचसूक्त पवमान पठण करीत श्रींच्या पादुकांवर महा अभिषेक संपन्न झाला. सुगंधी द्रव्ये, उष्णोधकाने मांगलिक स्नान झाले. स्वच्छ वस्त्राने पादुका आणि श्रींचे चरण कमल कोरडे केले. त्यांवर कस्तुरी, केशरसमन्वित  चंदन आणि परिमल द्रव्य अर्पण केली. नानाविध प्रकारची सुगंधी फुले अर्पण केली. ब्रम्हा, विष्णू, महेश यांचा एकोभाव असलेल्या श्रीपादकांना तुलसीपत्रे,बिल्वदले, शमीपत्रे वाहिली.


पादुकांसमोर मांडलेल्या सप्तआवरणाचेही पूजन झाले. अष्टसुगंधित धूपारतीने ओवाळले गेले. गाईच्या तुपात भिजवलेल्या वाटीचे दीपदर्शन झाले. नानाविध फळे आणि दूध यांचा नैवेद्य दाखवून झाला. विडा दक्षिणा देऊन महानिरांजनाने पुन्हा एकदा ओवाळले गेले. कर्पूर आरती करून साष्टांग प्रणिपात केला. गंभीर आवाजात मंत्र पुष्प मंत्र म्हटले आणि श्रींच्या सन्मुख श्री भैरंभटजींनी प्रार्थना केली,  "महाराज; केवळ आपल्या आशीर्वादाने आणि कृपेमुळे आपल्या या दिव्य पादुकांचे पूजन आमच्याकडून घडले आहे. आपणच दिलेल्या आशीर्वाचनाप्रमाणे आमच्या पुढील पिढ्यातील वंशांकडून सुद्धा यावच्चचंद्रदिवाकरौ अशीच पूजा अखंड करून घ्यावी. सर्वांना शुद्ध बुद्धी द्यावी. धन, धान्य, यश,कीर्ती, संतती, समृद्धी यांचा लाभ व्हावा. मानवी स्वभावानुसार काही अपराध घडले तरी आपण मातृहृदयाने उदार  अंत:करणाने सर्वांना क्षमा करावी. सर्वांना आपले कृपा छत्र अखंड लाभावे. आपल्या मनोहर पादुकांच्या दर्शनासाठी, सेवेसाठी येणाऱ्या सर्व भक्तांची संकटे दूर करून त्यांच्या मनोकामना पूर्ण कराव्यात !"  अत्यंत कारुण्यभावाने केलेली ही प्रार्थना ऐकताच सर्वांची हृदय सद्गतीत झाली. आकाशातून पुष्पवृष्टी झाली.


श्रींची अशी ही महापूजा घडे पर्यंत भैरंभटपत्नी आणि इतर स्त्रियानी पूरणावरणाचा स्वयंपाक केला. प्रत्यक्ष अन्नपूर्णा माता तेथे प्रतिष्ठित होती. केळीच्या दोन पानावर शाकापाकादी सर्व पदार्थ वाढले. त्यातील एका पानावरील अन्नाचा श्रीपादुकांना नैवेद्य दाखवला. दुसऱ्या पानावर श्रीस्वामी महाराजांना विधिवत भिक्षा वाढली. श्रीस्वामी महाराजांनी मोठ्या आवडीने ते अन्नग्रहण केले. जमलेल्या सर्वांना भोजन करण्याची अनुमती दिली. तो महाप्रसाद घेऊन सर्वजण तृप्त झाले. कृष्णेमध्ये हस्तप्रशालन केले. त्या अन्नाचे कण मिळावे म्हणून इंद्रादी सकलदेवतांनी मत्स्यरूपाने जलप्रवाहात मोठी दाटी केली. राघू, चिमण्यांच्या रूपाने जमिनीवर सांडलेले अन्नकण टिपले.


तिथे जमलेल्या सर्व मंडळींमध्ये एकाच विषयाची चर्चा चालली होती; आणि तो विषय म्हणजे श्री महाराज आणि मनोहर पादुकांचे अभिन्नत्व ! प्रत्येक जण पुन:पुन्हा महाराजांच्या दिव्यमूर्तीचे आणि त्या मनोहर पादुकांचे अवलोकन करून ते रूप अंतःकरणामध्ये साठवीत होता. घटका दोन घटका अशाच निघून गेल्या. श्री महाराजांचे रूप आणखी तेजस्वी दिसू लागले. ते आसनावरून उठून उभे राहिले. त्यांनी दंड-कमंडलू हाती घेतले. श्री भैरंभटांना कुठेतरी प्रयाण करण्याची त्यांची तयारी जाणवली. त्यांनी महाराजांचे चरण घट्ट पकडले आणि  "महाराज; आम्हाला सोडून कुठेही जाऊ नका !" अशी कळकळीने विनंती केली. त्यांच्या डोळ्यातील अश्रूंचा श्री महाराजांच्या चरणांवर जणू अभिषेकच झाला. श्री महाराजांनी त्यांना उठवले आणि त्यांचे सांत्वन करीत म्हणाले; "तुमच्यासारखे इतर अनेक भक्तजन आमची वर्षानुवर्ष वाट बघताहेत. त्यांच्यासाठी आम्हाला आता गंधर्वपुरीला जावे लागत आहे. आणि तुम्ही शोक कशासाठी करता ? आम्ही तर या पादुकांच्या रूपाने येथे सदैव राहणार आहोतच ना  ? तुम्ही  स्मरण कराल तेव्हा तुमच्यासमोर प्रकट होऊ. तुम्ही मुळीच चिंता करू नका !"


श्री स्वामी महाराजांच्या त्या आश्वासक मधुर वाणीने श्री भैरंभट भानावर आले सर्वांनी श्री स्वामींना साष्टांग प्रणिपात केला. श्री स्वामींनी पूर्वेकडे मुख केले सावकाश पावले टाकीत ते कृष्णा प्रवाह जवळ आले. प्रवाह दुभंगला त्यात उतरता सुगंधी फुलांची झाडे आणि चौकात पुष्करणी असलेला एक सुंदर राजमार्ग तयार झाला असलेला सर्वांना दिसला. त्यावरून पुढे पुढे जात श्री महाराज दिसेनासे झाले. राजू मार्ग अदृश्य झाला कृष्णेच्या प्रवाहावर पुन्हा लहरी प्रकटू लागल्या. हात जोडले पुन्हा आश्रमामध्ये पादुकांसमोर आले आणि त्यांनी एक नवल पाहिले त्या पादुकांच्या स्थानी श्री गुरु मूर्ती स्मित वदनाने बसले होते. त्या वृद्ध दांपत्यासह सर्वांनाच पुन्हा एकदा आश्चर्य आणि आनंदाचा गहिवर आला. आता मात्र भैरंभट दाम्पत्याने श्री गुरुरायांचे चरण पकडले आणि म्हणाले, "महाराज या मनोहर पादुकांची आजच पहिली महापूजा घडली आहे आमच्याकडून प्रत्यक्ष सेवा करून घेण्यासाठी आपण आणखी काही थोडे दिवस तरी थांबावे. एवढी आमची एवढी कळकळीची प्रार्थना मान्य करावी  !" श्रीनरहरीरायांनी त्या वृद्ध दांपत्याची श्रद्धापूर्वक विनंती मान्य केली. पुढे माग महिन्याच्या पौर्णिमेपर्यंत श्री भैरंभटाने नित्य नव्या उमेशाने श्रीचरणांची आणि श्रीमहाराजांची पूजा सेवा केली.


मागवद्य प्रतिपदा उजाडली श्रीमहाराजांनी आता कृष्णा पंचगंगा संगम स्थळ  सोडून गंधर्वपूर येथे जाण्याचा निश्चय श्री भैरंभटांना सांगितला मागवद्य पंचमी हा प्रयाणाचा दिवस ठरला. श्री भैरंभटांसह सकल भक्तजनांनी पाच दिवस नवरात्र अनुष्ठान मांडले. श्रद्धा, भक्तीभावाचा कल्लोळ उसळला. पंचमीला श्री महाराजांची व पादुकांची महापूजा संपन्न झाली. दध्योदनाचा नैवेद्य झाला. त्यावेळी श्री महाराज खूपच तेजस्वी दिसत होते. दंडकमंडलु हाती घेऊन ते उभे राहिले. श्री भैरंभटांना वियोगाची कल्पना सहन होईना. त्यांना पुन्हा गहिवरून आले. त्यांनी श्रींचे चरण घट्ट पकडले. श्री गुरुंनी त्यांना उठवले आणि त्यांची समजूत  घालीत म्हणाले, "शोक करू नका. आम्ही तर पादुकांच्या रूपाने येथे सदैव राहणार आहोत. तुम्ही स्मरण कराल तेव्हा प्रकट होऊ !" एवढे बोलून श्री स्वामी महाराज गुप्त झाले ते थेट गाणगापुरात प्रकटले. तेथे त्यांनी २३ वर्षे आर्त भक्तजनांच्या उद्धाराचे कार्य केले आणि श्री शैल्य येथे जाऊन निजामंदी गमन केले. तो दिवस होता मागवद्य प्रतिपदा, बहुधान्य नाम संवत्सर, श्रीशालीवाहन शके १३७९. ते कन्यागत पर्व काळाचे वर्ष होते.


इकडे श्री भैरव भटाच्या आप्तस्वकीयांनी त्यांच्यासाठी संगमापासून थोड्या अंतरावर उंच ठिकाणी एक छोटे घरकुल बांधून दिले. अलास, अमरापूर, गोपूर, कुरुंदवाड, शिरोळ येथील मंडळी मनोहर पादुकांच्या दर्शनाला नित्य येऊ लागली. त्यादिव्य पादुकांच्या पूजन अर्चनामध्ये भैरंभट दांपत्य रमून गेले. एक नवा उन्मेष त्यांच्या तनमनामध्ये निर्माण झाला त्यांची थोरवी सगळ्यांनीच ओळखली होती.


एके दिवशी एक नवलाची वार्ता सगळ्यांना कळली. भैरंभट पत्नी गरोदर राहिली. तिचे कोड कौतुक हवे नको बघायला माहेरची मंडळी आली. शेजारी घर करून राहू लागली. नऊ महिने, नऊ दिवस भरले. एक उत्तम पुत्र झाला जन्मला. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांचा आशीर्वाद यथार्थ झाला. मुलगा मोठा झाला श्रींच्या पादुकांसन्मुख त्याची मुंज झाली. वडिलांकडे त्याचे स्वशाखेचे अध्ययन झाले. तोही गुरु सेवेत रमला.


यथावकाश त्याचे लग्न झाले. त्याला चार पुत्र झाले. त्यांची नरहरी, जाबण, श्रीपाद आणि सखाराम अशी नावे ठेवली गेली. कालगतीला अनुसरून भैरंभट दांपत्य अनंतामध्ये विलीन झाले. पण त्यांच्या चार नातवांचे वंश औदुंबरांच्या फळांप्रमाणे विस्तार पावले. श्री भैरंभटाचे हे वंशज म्हणजेच श्रीक्षेत्र नृसिंहवाडी मधील आजचे समस्त पुजारी. श्री स्वामी महाराजांच्या या लाडक्या लेकरांनी गेल्या २० पिढ्यांमध्ये भैरंभटांनी घालून दिलेल्या परंपरेचे कसोशीने पालन केले आहे. ब्राह्म मुहूर्ता पासून नित्य कर्म सुरू होतात. शेजारती पर्यंतचे सगळे कार्यक्रम आणि वर्षातले नित्यनैमित्तिक सोहळे, नित्य नव्या उत्साहाने होत असतात. त्यांच्या देहात ,मनात योगिनींचा संचार असतो. या क्षेत्रामध्ये अन्नपूर्णा दररोज संतर्पण करते. त्यामुळे मनुष्यमात्रच काय पण पशुपक्षी सुद्धा तृप्त होतात. जान्हवीच्या सान्निध्याने अवघा परिसर अखंड मंगलमय वाटतो. या सर्वांचे रहस्य समस्त पुजारी मंडळींना माहित आहे. म्हणूनच ते नित्य म्हणतात


 विजयते श्रीनृसिंह सरस्वती |

 अवधूत चिंतन श्रीगुरुदेव दत्त |

अंबाबाईच का🌸

 अंबाबाईच का🌸

कोल्हापूरची देवी महालक्ष्मी नसून 'अंबाबाई' आहे.

१) कोल्हापूरची देवीचे नाव हे 'अंबाबाई'  आहे. तिचे महालक्ष्मी नाव कधीच नव्हते. भारतामध्ये देवी आदिशक्ती सतीची ५२ शक्तिपीठे आहेत. त्यापैकी साडे ३ शक्तीपीठ महाराष्ट्रात आहेत. तुळजापुरची भवानी माता, माहुरगडाची रेणुका माता, कोल्हापूर ची अंबाबाई, आणि अर्धे शक्तीपीठ वणीची सप्तशृंगी. जर कोल्हापूरची अंबाबाई शक्तीपीठ म्हटलं तर ती कधीच विष्णू पत्नी होणार नाही. कारण सतीची कलेची ५२ तुकडे ज्या ठिकाणी पडले त्या ठिकाणी ५२ शक्तीपीठ तयार झाले. अंबाबाई ही शिवपत्नी आहे.


२) अंबाबाई च्या देवळात अंबाबाई च्या गाभाऱ्यावर पहिल्या मजल्यावर शिवमंदिर आहे. तिने शिवाची मातृका पिंड धारण केली आहे. अंबाबाई च्या मूर्तीचा अभ्यास केल्यास तिने कोणत्याही प्रकारे विष्णू चिन्ह परिधान केलं नाही आहे. उलट अंबाबाई मूर्ती जवळ वाहन सिंह आहे.  सगळी शिवचिन्ह आहेत.


३) आता मुद्दा तिरुपती- अंबाबाई ह्या गैरसमज बद्दल.

 काही वर्षपूर्वी काही तिरुपती भक्त आई अंबाबाई च्या ट्रस्ट च्या अधिकार कक्षेत आल्यामुळे त्यांनी ह्या चुकीच्या प्रथा पाडण्यास सुरवात केली. 

आपण डोळसपणे पाहिल्यास असे लक्षात येईल की  तिरुपती देवस्थान कडून शालू भेट देण्याची प्रथा सुरू केली. ही मागील २० वर्षातच चालू आहे (या अगोदर अशी कोणतीही प्रथा नव्हती), हे कमी की काय, 

तिरुपती देवस्थान सारखे लाडू चा प्रसाद देण्याची सुरवात केली, ( या आधी लाह्या आणि बत्तासे चा प्रसाद मिळत असे). 


अंबाबाई नाव बदलून महालक्ष्मी नाव पुढे केलं गेलं (२००० सालाच्या अगोदर एकही सरकारी कागदपत्रात महालक्ष्मी म्हणून  कुठेही उल्लेख नाही. अगदी इंग्रजांच्या काळातली सुद्धा कागद पत्रात 'अंबाबाई' च उल्लेख आहे.


४) सर्वात महत्वाचे कोणत्याही दानव, राक्षस अधर्मी वृत्ती यांचा संहार माता पार्वती करते कारण ती आदिमाया जगदंबा आहे. तिने शस्त्र धारण केले आहेत. अंबाबाई ने या कारणास्तव कोल्हासुरचा वध केला आहे. लक्ष्मी माता ही संहारक नाही. ती धन पूरक देवता आहे. ती कोणाचा वध करत नाही.


५) शेवटचा मुद्दा श्रीविष्णू (तिरुपती) यांची पत्नी लक्ष्मी (पद्मावती) यांचे मंदिर तिरुपती पासून ५ किलोमीटर वर च आहे. 


सारांश-  

काही लोक आपल्या हट्टापायी माता पार्वतीच्या शक्तीपीठ ला उगाच विष्णुपत्नीचे रूप देत आहेत

डेंग्यू आणि प्लेटलेट्स

 डेंग्यू आणि प्लेटलेट्स   

        

प्रसंग 1-

 एक तरुण मुलगा नुकताच माझ्याकडे डेंग्यूने एडमिट होता. खूप ताप होता. प्लेटलेट्स कमी झाल्या होत्या. त्याच्या हृदयाचे ठोके, रक्तदाब व तापाचे प्रमाण आणि इतर लक्षणांप्रमाणे उपचार चालू होते. त्यावेळी मला आमच्या वॉर्ड मधील सिस्टर यांचा फोन आला. नातेवाईक इथे खूप बडबड करत आहेत. आमचा रुग्ण गंभीर असून पण त्याला कुठलेही हायर अँटीबायोटिक दिलेले नाही.मी त्या रुग्णाच्या नातेवाईकांना बोलावून समजावून सांगितले की त्याला अँटिबायोटिकची काहीही गरज नाही


 प्रसंग २-

डेंग्यूचा रुग्ण 

पहिल्या  दिवशी प्लेटलेट्स 1,70,000.

दुसऱ्या दिवशी 1,40,000.

तिसऱ्या दिवशी 90,000

चौथ्या दिवशी 55,000

रुग्णाच्या नातेवाईकांचा प्रश्न  होता..ऍडमिट केल्यानंतर सुद्धा प्लेटलेट इतक्या कमी होत आहेत,  मग डॉक्टर तुम्ही काय करतात? काही उपचार का करत नाही?


 प्रसंग 3-

 प्लेटलेट्स 2,15,000वरून55,000 ने एकदम कमी होऊन16,000 इतक्या झाल्या आहेत. त्यामुळे पेंशटला खूप टेन्शन आले आहे.


प्रसंग 4-

ऍडमिट केल्यानंतर चौथ्या दिवशी पेशंटची तब्येत अचानक खालावली. बीपी कमी झाले. छातीत पाणी झाले. त्याला ताबडतोब आयसियुत हलवावे लागले. ऍडमिट करून पण त्याची तब्येत खालावली म्हणजे डॉक्टरांचे दुर्लक्ष झाले आहे


प्रसंग 5-

प्लेटलेट्स50,000 वरून18,000 इतक्या झाल्या. जर डॉक्टरांनी आधीच प्लेटलेट दिल्या असत्या तर ही वेळ आली नसती. डॉक्टरांनी उशीर केला आहे.


     आता आपण डेंग्यू या आजाराबद्दल शास्त्रीय माहिती जाणून घेऊ आणि या सर्व प्रश्नांची उत्तरे बघूयात...


    डेंग्यू हा आजार 'डेंग्यू व्हायरस'या फ्लावी व्हायरस गटातील विषाणूमुळे होतो. हा विषाणू एडीस इजिप्ती या डासाच्या चाव्यामुळे मनुष्याच्या शरीरात प्रवेश करतो.

    डेंग्यू व्हायरसचे चार सीरो टाइप्स आहेत.

    DEN 1,DEN 2,DEN 3,DEN 4.

    जर यातल्या एकामुळे डेंग्यू झाला तर ज्या संरक्षक अँटीबोडीज तयार होतात, आयुष्यभर त्या रुग्णाचे त्या सिरोटाईप पासून संरक्षण करतात.  परंतु दुसऱ्या सिरो टाईपमुळे त्याला डेंग्यू परत होऊ शकतो. त्यामुळे एका रुग्णाला आयुष्यात चार वेळा डेंग्यू होऊ शकतो.

    डेंग्यूचा डास चावल्यानंतर साधारण पाच ते सात दिवसांनी लक्षणे दिसू लागतात.


लक्षणे  - 

तीन अवस्था असतात.

पहिली अवस्था ..तापाची

दुसरी अवस्था.. गंभीर गुंतागुंत होण्याची                                             

तिसरी अवस्था ..हळूहळू सुधारणा होण्याची


पहिल्या अवस्थेतील लक्षणे..

ताप, अंगदुखी, डोकेदुखी, हाडे दुखणे, सांधे दुखणे, स्नायू दुखणे, डोळ्यांच्या मागे दुखणे, शरीरावर पुरळ येणे, थकवा, अशक्तपणा, बारीक बारीक रक्तस्त्राव होणे.. उदाहरणार्थ नाकातून रक्तस्त्राव.



दुसऱ्या अवस्थेतील लक्षणे...

       नंतर रुग्ण दुसऱ्या अवस्थेत जातो यावेळी गंभीर लक्षणे उत्पन्न होऊ शकतात .रक्तदाब कमी होणे, फुफुसात किंवा पोटात पाणी जमा होणे. याचवेळी भान हरपणे, यकृताला सूज येणे इ. लक्षणे दिसू लागतात. रुग्णाची परिस्थिती गंभीर होते. यावेळी रुग्णाचा मृत्यू होण्याची पण शक्यता असते  सलाईन आणि इतर सपोर्टिव्ह (फक्त आधार)उपचारांचा योग्य वापर यावेळी अतिशय कुशलतेने करावा लागतो. ही धोक्याची अवस्था ओलांडल्या नंतर हळूहळू रुग्णाच्या प्रकृतीत सुधारणा होते.

     थकवा आणि अशक्तपणा मात्र बरेच दिवस राहू शकतो.


निदान.. 

   डेंग्यू ची लक्षणे असलेल्या रुग्णांमध्ये रक्ताच्या तपासण्या करतात यात RTPCR किंवा NS 1 ANTIGEN चाचणी positive आली तर डेंग्यू चे निदान करता येते 

   नुकताच डेंग्यू होऊन गेलेल्या रुग्णांमध्ये IgM ही चाचणी positive दिसते आणि ती antibody चाचणी असल्याने ती दोन ते तीन महिने positive दिसू शकते. डेंग्यू सोडून इतर फ्लावी व्हायरस विषाणूंमध्ये सुद्धा या चाचण्या positive दिसू शकतात आणि डेंग्यूचे निदान चुकू शकते. 

    RTPCR ही जरी जास्त अचूक चाचणी असली तरी ती महागडी आहे आणि लवकर उपलब्ध होत नाही. याशिवाय डेंग्यू च्या रुग्णांमध्ये इतर काही COMPLICATIONS झाले आहेत किंवा नाही हे बघण्यासाठी इतर तपासण्या लागतात.


 उपचार-

    डेंग्यू वर अजून पर्यंत कुठलेही उपचार उपलब्ध नाहीत. फक्त supportive treatment (आधारात्मक उपचार) करावे लागतात. म्हणजे शरीरातील पाण्याची पातळी योग्य ठेवणे रक्तदाबावर लक्ष ठेवणे. फुप्फुस, यकृत, किडनी यांना सूज आल्यास त्यावरील उपचार करणे.

     मलेरिया किंवा हार्ट अटॅक वर पण औषधे उपलब्ध आहेत .परंतु डेंग्यू वर नाही 

    प्लेटलेटच्या पेशी कमी होऊ नये किंवा पेशंट पहिल्या तापाच्या अवस्थेतून दुसऱ्या गंभीर गुंतागुंतीच्या अवस्थेत जाऊ नये यासाठी प्रतिबंधात्मक कुठलीही औषधे नाहीत. शरीरातील पाण्याची पातळी योग्य राखणे खूप महत्त्वाचे आहे .या आजारात रक्तवाहिन्यांमधून द्रव पदार्थ लिक होतो आणि रक्तवाहिन्यातील पाणी कमी होते  पाण्याची पातळी कमी झाल्यास रक्तदाब कमी होऊ शकतो. फुफुसात किंवा पोटात जर पाणी जमत असेल  आणि त्यात पाण्याची पातळी वाढल्यास अडचणींमध्ये भर पडू शकते.  आणि हे संतुलन अतिशय अवघड असते.


प्लेटलेटच्या आकड्यांचा खेळ आणि वास्तव..

       प्लेटलेट या शरीरात रक्तस्त्राव थांबवण्याचे काम करतात  सर्वसामान्यपणे प्लेटलेटची संख्या शरीरात दीड लाख प्रति मिलीलीटर पेक्षा जास्त असते. डेंग्यूच्या आजारात प्लेटलेट ची संख्या कमी होते.

     जर रुग्णाला रक्तस्त्राव होऊ लागला आणि प्लेटलेट ची संख्या कमी असेल तर त्याला प्लेटलेट्स द्याव्या लागतात.

    अन्यथा प्लेटलेट ची संख्या 10,000  किंवा काहीवेळा 5,000 पेक्षा कमी झाली तरच प्लेटलेट्स द्याव्यात असे शास्त्रीय मार्गदर्शक तत्वे आहेत. त्यामुळे प्लेटलेट्सची संख्या कितीने कमी झाली वगैरे आकडे बघणे निरर्थक आहे.

     या दिलेल्या प्लेटलेट्स फक्त काही वेळ म्हणजे काही तास शरीरात टिकतात आणि नंतर प्लेटलेट पुन्हा कमी होतात. पुन्हा प्लेटलेट्स द्यावे लागतात.

     डेंग्यू च्या आजारात प्लेटलेट्स कमी होऊ नये यासाठी कुठलेही प्रतिबंधात्मक औषध उपलब्ध नाही.

      प्लेटलेट्स देणे हा डेंग्यू वरील उपचार नाही. त्याने रुग्ण बरा होत नाही किंवा आजाराचा कालावधी कमी होत नाही. किंबहुना काही वेळा या प्लेटलेट्स घातकही ठरू शकतात. परंतु अज्ञानापोटी बऱ्याच रुग्णांचे नातेवाईक प्लेटलेट्स लावण्याचा आग्रह धरतात जे काही वेळा धोकादायक ठरू शकते.

      जर रुग्णाला रक्तस्राव होत नसेल आणि त्याच्या प्लेटलेटची संख्या 10,000पेक्षा जास्त असेल तर त्याला प्लेटलेट्स लावणे हे फायद्यापेक्षा तोट्याचे जास्त ठरू शकते. शिवाय आर्थिक भुर्दंड वेगळाच!

     प्लेटलेटशी संख्या वाढवण्यासाठी काही औषधी उपलब्ध असतात उदाहरणार्थ inj Romiplastin. परंतु डेंग्यू च्या आजारात ही औषधे उपयोगी ठरत नाहीत. अगदी शेवटचा उपाय म्हणून स्टेरॉईडची इंजेक्शन दिली जाऊ शकतात. परंतु अजूनही त्यांची उपयुक्तता सिद्ध झालेली नाही.

    प्लेटलेट्स हा घटक अत्यंत जीवनावश्यक आहे आणि योग्य परिस्थिती असेल तर तो देणेही आवश्यक आहे.

   थोडक्यात खूप अत्यावश्यक असेल तरच प्लेटलेट्स द्याव्यात अन्यथा त्यात फायद्यापेक्षा नुकसान होण्याची शक्यता जास्त असते.


प्लेटलेट ट्रान्सफ्युजनचे संभाव्य धोके..

 1)Febrile non hemolytic transfusion reaction... यामुळे ताप ,उलट्या, मळमळ ,जीव घाबरणे ,रक्तदाब कमी होणे होऊ शकते.


 2)Allergic and anaphylaxis... गंभीर स्वरूपाची रिएक्शन येऊ शकते


 3)TRALI Transfusion related acute lung injury...फुफ्फुसाला गंभीर स्वरूपाची इजा होते.


 4)Transfusion associated Graft vs host disease...प्लेटलेट्स दिल्यानंतर एक ते सहा आठवड्यांनी ही गुंतागुंत होऊ शकते


 5)Post transfusion purpura


 6)Transfusion related immunomodulation


 7)platelet refractoriness... प्लेटलेट्स दिल्यानंतर प्लेटलेटची संख्या अपेक्षित वाढत नाही किंबहुना ती आणखी कमी होते


 8)Circulatory overload...हृदयावर आणि फुफ्फुसावर ताण पडतो


 9)संसर्ग जन्य आजार काही जिवाणू आणि विषाणू त्याद्वारे रुग्णाच्या शरीरात जाऊ शकतात


10)रक्तदाब खूप कमी होणे.. विशेषता जे रुग्ण ACE INHIBITORS या उच्च रक्तदाबावरच्या गोळ्या घेत असतात त्यांच्यामध्ये.

     प्लेटलेट्स हा डेंग्यू आजारावरील प्रत्यक्ष उपचार नाही तो एक तात्पुरता आधार आहे तोही डॉक्टरांच्या सल्ल्याशिवाय घेणे धोकादायक ठरू शकते


     डेंग्यू या आजारावर प्रत्यक्ष उपचार नसल्यामुळे त्याला प्रतिबंध करणे हाच सर्वोत्तम मार्ग आहे. डासांपासून आपला बचाव करणे हेच सर्वात इष्ट होय.


निष्कर्ष..


 1) डेंग्यू वर कुठलेही प्रत्यक्ष औषध उपलब्ध नाही.फक्त supportive treatment


 2) प्लेटलेट कमी न होऊ देणे, प्लेटलेट्स वाढवणे किंवा गुंतागुंत होऊ न देणे यासाठी कुठलेही औषध उपलब्ध नाही.


3)प्लेटलेट्स देण्याचा निर्णय खूप विचारपूर्वक घ्यावा लागतो.


4) प्रतिबंध हाच सर्वोत्तम उपचार . 


 डॉ. संजय संघवी 

कन्सल्टींग *फिजिशियन

श्री सिद्धेश्वर मल्टी स्पेशालिटी हॉस्पिटल ,

धुळे.

त्या रावणाला दहा तोंडे होती. आजच्या रावणांना दहा पोट आहेत. हपापाचा माल कितीही गपापा केला तरी त्यांची क्षुधा शमत नाही. तो रावण दशग्रंथी ब्राह्मण होता, आजचे रावण तर अक्षरशून्य आहेत, अक्कलेच्या जागी डोक्यात कांदे बटाटे भरले आहेत! 


एक रावण होता तर भगवंताला अवतीर्ण व्हावं लागलं होतं. आज रावणांची मोजदाद करणं कठीण आहे एवढी त्यांची संख्या वाढली आहे. 


नुसतं " मन से रावण जो मिटाएं राम उसके मन में हैं” म्हणत रावणाचा विनाश होत नाही. कृती करावीच लागते. जे त्या भगवंताच्या अवताराला चुकले नाही ते कर्म आपल्यासारख्या पामरांना कसे चुकेल? 


तस्मात् केवळ रामनाम जपत राहणे पुरे, त्यांच्यासारखी कृती करणे क्रमप्राप्त आहे. 


प्रकाण्डकाण्डकाण्डकर्मदेहछिद्रकारणम्

कुकूटकूटकूटकौणपात्मजाभिमर्दनम्।

तथागुणंगुणंगुणंगुणंगुणेन दर्शयन्

कृपीटकेशलंघ्यमीशमेकराघवं भजे ॥४॥

जो आपल्या तीक्ष्ण बाणांनी निंदनीय कृत्य करणार्‍या राक्षसांच्या देहांना छेदतो,जो अधर्माच्या वाढीसाठी भ्रम आणि असत्याचा आश्रय घेणाऱ्या मदमस्त राक्षसांना मारतो,जो आपल्या पराक्रमाने आणि आपल्या धनुष्याच्या आधारे आणि चतुराईने राक्षसांचा पराभव करतो.मी त्या राक्षससंहारक राघवाची पूजा करतो

योगायोग ⫸

आज हसबनीसांची मंडळी मुलगी बघायला 

येणार होती. आणि मुलगी अर्थात मीच केयुरी पागे. खरंतर मला हे दाखवून घेणे वगैरे नाही आवडत. खूप चिडचिड होते. आई-बाबा बोलले तुझ्या मनात कुणी आहे का? आता मनात असणारा समोर तर यावा लागतो नं?


आईच्या सांगण्यावरून मी साडी नेसले. मंडळी आली. मी बाहेर आले. एकनजर टाकली. सगळे माझ्याकडेच बघत होते. मुलगा मला खूप आवडला. पण तो एक शब्दही बोलला नाही. कार्यक्रम झाला. मंडळी चहा, पोहे घेऊन गेली. पण, आई-बाबा बोलले, मुलगी पसंत नाही असे वाटते. मुलगा काही बोललाच नाही. मी आरशात मला न्याहाळत होते. कधीच मी असे मला बघत नाही. चक्क गाणे गुणगुणत होते. नेहमी जीन्स टाॅप घालणारी मी, चक्क सजु लागले. मला त्याला भेटण्यासाठी उत्सुकता,ओढ वाटू लागली. पण त्यांच्याकडून अजुनही उत्तर नव्हते. चार दिवस झाले उत्तर नाही. बाबा दुसरी स्थळे बघायला लागले. माझ्या मनात फक्त तोच. काय करणार नं? 'दहा वीस असती कारे मने उध्दवा, एकमात्र होते ते मी दिले माधवा' अशी काहीशी माझी आवड होती. एका रात्रीची वेळ. घरात सगळे गाढ झोपले होते. मी बाबांचा फोन घेतला. त्यात त्याच्या वडिलांचा नंबर होता. मी काॅल लावला, हॅलो. पलिकडून त्याचे वडिलच बोलत असावेत. मी फोनवर रूमाल टाकला. आणि वेगळ्याच आवाजात बोलले, "माफ करा. पण मी योगायोग वधूवरसूचक मंडळातून बोलते आहे. सकाळ पासून तुमचा फोनच लागत नाही. त्या केयुरी पागेचे स्थळ बघितलेत नं? काय झालं?"


माझ्या छातीत जाम धडधडत होते. पण वडिल बिचारे मुलाला विचारत होते, "अरे त्या केयुरी पागेला होकार कळवू का?" आणि ते फोन वर बोलले, "मुलीला स्थळ पसंत आहे का?" 

"हो हो आहे!"

"मग कळवा होकार."

मी फोन खाली ठेवला. मस्त पैंकी एक डान्स सुरु केला. आमच्या पराक्रमाने खुर्चीवरचे बाॅक्स पडले. आई आत आली. मला नाचताना बघून बोलली, "वेड लागलं का? कार्टे तुला काही ताळतंत्र?" मी तिला सांगितले, "योगयोग वधूवर सूचकांचा फोन होता. हसबनिसांना मुलगी पसंत आहे."


आई खूप खूष झाली. तिने देवापुढे साखर ठेवली. बाबांना ऊठवले. बाबा बोलत होते. "फोनची बेल मला कशी ऐकू आली नाही? आणि एवढ्या रात्री फोन कसा काय केला?" मी धूम ठोकली. आज माझा साखरपुडा, जाम खूष होते. खूप सजले होते. बाहेरच्या खोलीत सगळी मंडळी बसली होती. मी हळूच बाहेर आले. तर, समोरच त्या वधूवरसूचक मंडळाच्या बाई चपला काढून येत होत्या. त्या सगळ्यांना बोलतच आल्या, "अहो एवढ्या रात्री मी फोन करेन का?" सगळे आश्चर्याने बघत होते. मी सगळ्यांना नकळत त्यांच्याकडे पाहिले. तो अनिमिष नेत्राने माझ्याकडे बघत होता. आणि मी त्याला हळूच डोळा मारला. तो हसत होता. मी मात्र खाली मान घालून बसले होते हो. एकदम सोज्वळ, पक्की बाळबोधी बनून.

परहिता चे चिंतन

एक राजा होता त्यांना शिल्पकलेची खूप आवड होती. मूर्तीच्या शोधात तो विविध देश-विदेशात जात असतं. अशा रीतीने राजाने आपल्या महालात अनेक मूर्ती आणल्या होत्या आणि त्यांची काळजी राजा स्वतः घेत असतं.


सर्व मूर्तींमध्ये, त्यांना तीन मूर्ती त्याच्या प्राणापेक्षा जास्त प्रिय होत्या. सगळ्यांना माहीत होतं की, मुर्ती राजांना खूप आवडतात.


एके दिवशी एक सेवक या मूर्तींची साफसफाई करत असताना चुकून एका मुर्तीचा हात तुटला. जेव्हा राजाला हे कळले तेव्हा  राजाने खूप रागावले आणि त्यांनी ताबडतोब त्या सेवकाला मृत्युदंड शिक्षा सुनावली.


शिक्षा ऐकल्यानंतर नोकराने लगेचच इतर दोन मूर्तीही तोडल्या. हे पाहून सर्वांनाच आश्चर्य वाटले.


राजाने सेवकाला याचे कारण विचारले, तेव्हा तो सेवक म्हणाला - "महाराजा! मला क्षमा करा, या मूर्ती मातीच्या बनवलेल्या असून अत्यंत नाजूक आहेत त्या मुर्ती अमरत्वाचे वरदान घेऊन आलेले नाहीत, आज ना उद्या, ती तुटली असती, माझ्यासारख्या एखाद्या नोकरांच्या हातून तोडली असती तर तिला विनाकारण फाशीची शिक्षा भोगावी लागली असती. मला आधीच फाशीची शिक्षा झाली आहे, म्हणून मी इतर दोन मुर्ती तोडून त्या दोन लोकांचे प्राण वाचवले.


हे ऐकून राजाचे डोळे विस्फारले, त्याला आपली चूक कळली आणि त्याने सेवकाला शिक्षेतून मुक्त केले.


सेवकाने त्याला श्वासाचे मूल्य शिकवले आणि त्याला हे देखील शिकवले की न्यायाधीशाच्या आसनावर बसणे आणि वैयक्तिक प्रेमातून लहान गुन्ह्यासाठी फाशीची शिक्षा देणे हा त्या आसनाचा अपमान आहे. एखाद्याने नेहमी उंच आसनावर बसून त्या आसनाचा आदर केला पाहिजे. राजा असो किंवा इतर कोणीही, जर त्याला न्याय देण्यासाठी निवडले गेले असेल तर त्याला न्यायाचे महत्त्व समजले पाहिजे.


राजाला मूर्ती आवडत असे पण त्याच्या सेवकाला फाशीची शिक्षा देणे न्यायाच्या विरुद्ध होते. न्यायाच्या खुर्चीवर बसलेल्या कोणीही आपल्या भावनांपासून दूर जाऊन निर्णय द्यावा.


मरणाच्या इतक्या जवळ असूनही इतरांचा विचार करणारा हा सेवक माझ्यापेक्षा कितीतरी पटीने चांगला आहे हे राजाला समजले..!!


राजाने सेवकाला विचारले की, विनाकारण मृत्यूला सामोरे जाऊनही तू भगवंतावर रागावला नाहीस, तू निर्भय राहिलास, संयम, समविचारी स्वभाव आणि दूरदृष्टी हे गुण धारण करण्याची युक्ती काय आहे?


नोकराने सांगितले की, तुमच्या घरी काम करण्यापूर्वी मी एका श्रीमंत उद्योगपतीचा नोकर होतो. माझे मालक माझ्यावर खूप आनंदी होते पण त्यांना जेव्हा कधी कटू अनुभव आला तेव्हा ते देवाला खूप शिव्या द्यायचे.


एके दिवशी सेठ काकडी खात होते. योगायोगाने ती काकडी कडू होती. सेठने ती काकडी मला दिली. मी ते खूप चवदार असल्यासारखे खूप चवीने खाल्ली.


सेठने विचारले - "काकडी खूप कडू होती." तू असे कसे खाल्लीस?"


म्हणून मी म्हणालो - "सेठजी, तुम्ही माझे मालक आहात." दररोज स्वादिष्ट अन्न देता. एके दिवशी काही कडू दिले तरी ते स्वीकारण्यात काय हरकत आहे?


राजाजी, त्याचप्रमाणे जर देवाने एवढी सुख-संपत्ती दिली असेल आणि कधी कधी कडवे अनुदान दिले तरी त्याच्या सद्बुद्धीवर शंका घेणे योग्य नाही. जन्म, जीवन आणि मृत्यू ही सर्व त्याची देणगी आहे.


  बोध


खरं तर, जर आपण समजू शकलो तर जीवनात जे काही घडते ते सर्व ईश्वराच्या दयेमुळे होते. देव जे काही करतो ते चांगल्यासाठीच करतो..!! जर आपण सुख आणि दु:ख हे देवाचे प्रसाद मानून त्यांचा संयमाने स्वीकार केला पाहिजे आणि सदैव परहिताचा विचार केला पाहिजे. 

वकिलांची बुद्धीमत्ता किती थोर असते ह्याच ऊदाहरण.....🙏🙏🙏

महाविद्यालयीन विद्यार्थ्यांच्या एका गटाने वकिलाला विचारले, सर, 'वकिली' म्हणजे काय...?"

वकील म्हणाले, "यासाठी मी एक उदाहरण देतो.🤔🤔🤪🤪🤪


समजा दोन लोक माझ्याकडे आले. एक अतिशय स्वच्छ आणि दुसरा अतिशय घाणेरडा. मी दोघांना आंघोळ करून स्वच्छ होण्याचा सल्ला देतो.


आता तुम्हीच सांगा, त्यांच्यापैकी कोण आंघोळ करेल?"🤔🤔🤔🤪🤪


एक विद्यार्थी म्हणाला, “जो घाणेरडा आहे तो आंघोळ करेल🤪🤪🤪😀🤔🤔."

वकील म्हणाले, "नाही, फक्त स्वच्छ माणूसच हे करेल. कारण, त्याला आंघोळ करायची सवय आहे तर घाणेरड्या माणसाला स्वच्छतेचे महत्त्व कळत नाही."


वकील : "आता सांगा कोण आंघोळ करेल?"🤪🤪🤔🤔🤔

दुसरा विद्यार्थी म्हणाला, “स्वच्छ व्यक्ती.”😀😀😀🤔🤪🤪🤪🤔🤔


वकील म्हणाले, “नाही, घाणेरडा माणूस आंघोळ करेल कारण त्याला स्वच्छतेची गरज आहे.😀😀😀🤪


आता सांग, कोण आंघोळ करेल...?"

दोन विद्यार्थी म्हणाले, “जो घाणेरडा आहे तो आंघोळ करेल."😀😀🤪


वकील म्हणाले, “नाही, दोघेही आंघोळ करतील… कारण स्वच्छ माणसाला आंघोळ करायची सवय असते आणि गलिच्छ माणसाला आंघोळ करावी लागते.😀😀


आता सांगा आंघोळ कोण करणार?"😀😀🤔🤔


आता तीन विद्यार्थी एकत्र म्हणाले, “हो, दोघेही आंघोळ करतील."🤔🤔🤔😀😀😀

वकिलाने सांगितले, “चुक, कोणीही आंघोळ करणार नाही, कारण घाणेरड्याला आंघोळ करण्याची सवय नसते तर स्वच्छ माणसाला आंघोळ करण्याची गरज नसते.😀😀😀


आता सांगा आंघोळ कोण करणार?"

एक विद्यार्थी नम्रपणे म्हणाला, "सर, तुम्ही प्रत्येक वेळी वेगवेगळी उत्तरे देता आणि प्रत्येक उत्तर बरोबर असल्याचे दिसते. आम्हाला योग्य उत्तर कसे कळणार?"

🤔🤔🤔


वकिलाने सांगितले, "वकिली म्हणजे हेच आहे... वास्तव काय आहे हे महत्त्वाचे नाही... पण तुमचा मुद्दा बरोबर सिद्ध करण्यासाठी तुम्ही कसा आणि किती युक्तिवाद मांडू शकता हे महत्त्वाचे आहे."🤪🤪😀

विश्वास ✅

राजस्थानमधे, भगवान श्रीकृष्णाचे एक दयाळू भक्त होते. त्यांचं नाव रमेश चंद्र होतं. त्यांचे औषधाचे दुकान होते. त्यांच्या दुकानामधे एका कोपऱ्यात, भगवान श्रीकृष्णाचा एक छोटासा फोटो ठेवलेला होता.

रोज सकाळी जेंव्हा ते दुकान उघडत, तेंव्हा साफ-सफाई झाल्यानंतर, हात धुऊन रोज देवाचा तो फोटो ते स्वच्छ करत असत आणि श्रद्धापूर्वक धुप वगैरे दाखवत असत.


त्यांना राकेश नावाचा एक मुलगा होता, जो आपले शिक्षण पूर्ण करून त्यांच्या बरोबरच दुकानात बसत असे. तो आपल्या वडिलांना हे सर्व करताना बघत असे. तो नव्या पिढीतील एक शिक्षित नवयुवक असल्यामुळे, आपल्या वडिलांना समजावत असे की, देव वगैरे काही नसतं, हा सगळा मनाचा भ्रम आहे...


शास्त्र म्हणत की, सूर्य आपल्या रथावर बसून संपूर्ण ब्रम्हांडाची चक्कर मारतो, परंतु विज्ञानाने मात्र हे सिद्ध केलं आहे की, पृथ्वीच सूर्याभोवती फेरी मारते... ईश्वराचे अस्तित्व नाही आहे, हे पटवण्यासाठी तो विज्ञानातील अशी नवनवीन उदाहरणं त्यांना देत असे.


त्याचे वडील त्याच्याकडे प्रेमाने बघत आणि हसत असत. त्यांची या विषयावर वाद-विवाद करण्याची किंवा चर्चा करण्याची इच्छा नसे...


असेच दिवस निघून जात होते. वडील आता म्हातारे झाले होते. ते समजून चुकले होते की, आपला शेवट जवळ आला आहे. म्हणून एक दिवस ते आपल्या मुलाला म्हणाले, "मुला, तू ईश्वराला मान किंवा मानू नकोस, परंतु माझ्यासाठी हेच खूप आहे, की तू एक मेहनती, दयाळू आणि प्रामाणिक माणूस आहेस. परंतु तू माझं एक म्हणणं ऐकशील आणि त्याचे पालन करशील?”


मुलगा म्हणाला, " हो, बाबा सांगा ना, जरूर ऐकेन."


वडील म्हणाले, "मुला मी गेल्यानंतर, दुकानातील भगवान श्रीकृष्णाचा हा फोटो, तू दररोज स्वच्छ करत जा आणि जर कधी तू कोणत्याही अडचणीत सापडलास, तर हात जोडून श्रीकृष्णाला आपली अडचण सांग. बस, फक्त इतकच, मी सांगितलेले कर."


मुलाने होकार दिला.


काही दिवसांनंतर त्याच्या वडिलांचे निधन झाले आणि दिवस असेच सरत राहीले. एके दिवशी खूप जोरात पाऊस पडत होता. राकेश दिवसभर दुकानातच बसला होता आणि गिर्‍हाईकी पण कमीच होते. त्यात वीजपुरवठा पण खंडीत होत होता. इतक्यात, पावसात चिंब भिजलेला एक मुलगा, पळतच आला आणि म्हणाला, "दादा, हे औषध हवं आहे. माझी आई खूप आजारी आहे. डॉक्टरांनी सांगितले आहे, की जर ह्याचे चार चमचे, लवकरात लवकर आईला दिले गेले, तरच आई वाचेल. तुमच्याकडे हे औषध आहे का?"


राकेशने चिठ्ठी बघितली आणि लगेच म्हणाला, “हो, माझ्याकडे आहे हे औषध.” तो मुलगा खूप खुश झाला आणि औषध घेऊन निघून गेला. पण, हे काय!! तो मुलगा निघून गेल्यानंतर, थोड्या वेळाने जेव्हा राकेशची नजर काउंटर कडे गेली, आणि त्याला घाम फुटला...


कारण थोड्यावेळापूर्वीच एका ग्राहकाने उंदीर मारण्याचे औषध परत केले होते. लाईट नसल्यामुळे असा विचार करून, राकेशने ती बाटली काउंटरवरच ठेवली होती, की लाईट आल्यावर ती योग्य जागेवर परत ठेवता येईल.


परंतु जो मुलगा औषध घेण्यासाठी आला होता, तो आपल्या औषधाची बाटली घेऊन जाण्याऐवजी, उंदीर मारण्याचे औषध घेऊन गेला होता आणि त्या मुलाला लिहिता वाचता ही येत नव्हते!!!


"अरे देवा!” अनायासपणे  राकेशच्या तोंडातून हे शब्द निघाले, "हा तर मोठा अनर्थ झाला!!" तेव्हा त्याला आपल्या वडिलांनी सांगितलेली गोष्ट आठवली आणि तो लगेच हात जोडून भगवान श्रीकृष्णाच्या फोटोसमोर जाऊन दुःखी मनाने प्रार्थना करू लागला, "हे देवा! माझे वडील नेहमी म्हणत असत की तुम्ही आहात जर खरच तुम्ही असाल, तर आजच्या या अनहोनी पासून वाचवा. एका आईला तिच्याच मुलाच्या हातून विष पिऊ देऊ नका. देवा, तिला विष पिऊ देऊ नका !!!"


"दादा!" त्याच वेळी मागून आवाज आला... "दादा, चिखल असल्यामुळे मी घसरलो आणि औषधाची बाटली पण फुटून गेली! कृपया, तुम्ही मला एक दुसरी बाटली द्या...!"


देवाच्या, मनमोहक हास्याने भरलेल्या त्या फोटोकडे बघत राकेशच्या डोळ्यातून गंगा जमुना वाहू लागल्या!!!  त्या दिवशी त्याच्या मनात विश्वास उत्पन्न झाला, की कोणीतरी आहे, जो ही सृष्टी चालवत आहे... कोणी त्याला ईश्वर म्हणतात, तर कोणी सर्वश्रेष्ठ, तर कोणी सर्वव्यापी शक्ती, तर कोणी दैवी शक्ती!


सारांश, ”प्रेमपूर्ण आणि भक्तीयुक्त हृदयाने केलेली प्रार्थना कधीच दुर्लक्षित केली जात नाही...”


★ संकलक ★

प्रा. माधव सावळे

भोंडला

 भोंडला"


'सूर नवा ध्यास नवा'  मध्ये अवधूत गुप्तेने लोकांना एक प्रश्न विचारला. गुजरात्यांचा गरबा तर आपल्याकडे काय असतं? कोणत्याही स्पर्धकाला उत्तर देता आलं नाही. मग प्रेक्षकांना विचारल्यावर दोन तीन जण भोंडला म्हणले. मग भोंडल्याचं एखादं गाणं कोणतं? हा दुसरा प्रश्न विचारल्यावर शुकशुकाट पसरला. मग एका काकूंनी 'एक लिंबू झेलू बाई' हे गाणं म्हणलं पण तेही अर्धवट. हे गाणं एकट्या अवधूत गुप्तेनी सलग गायलं. नंतर परीक्षणात तो म्हणाला की इतरांचे सण साजरे करताना आपण आपलं विसरत चाललो आहोत. हा आपला ठेवा आहे आणि  हे आपल्याला जपलंच पाहिजे. हे भान आपली 'बनाना' आणि 'अॅपल' पिढीला घडवण्याऱ्या आपल्या लोकांना कळेल तो सुदीन. 

अवधूत गुप्तेना या  सगळ्यासाठी आपला सलाम 👌🏻👌🏻

"भोंडल्याची १६ गाणी"


भोंडला , भुलाई , हादगा अशा वेगवेगळ्या नावांनी ओळखला  जाणारा नवरात्रोत्सव आणि त्यातील लोकगीते  काळाच्या ओघात लुप्त होत चालली आहेत , घरातल्या  मोठ्या व्यक्ती , आजी यांना ती  सारी लोकगीते अगदी तोंडपाठ होती , परंतु त्याची  कुठेही नोंद न घेतल्याने संस्कृती , गाणी सारे काही विरून जाते आहे .

चला तर मग अशा दुर्मिळ लोकगीतांचे संकलन आपल्याकडे असणे गरजेचे नाही का ?

तीच परंपरा तीच गाणी आता आपल्या स्मार्ट वहीमध्ये ...अर्थात आपल्या 

स्मार्टफोन मध्ये ...

आपली मैत्रीण गावाकडची असो कि शहरातील , सर्वानीच जपावा हा अनमोल ठेवा ...


लोकसंस्कृती आपण जपली तरच पुढच्या पिढीत त्याचे संक्रमण होऊ शकते , त्यामुळे आपल्या आई , बहीण , जावा , मैत्रिणी सगळ्यांना सुपूर्त करूयात हा "नवरात्रीचा अमूल्य ठेवा" ...


१ ) ऐलमा पैलमा गणेश देवा, माझा खेळ मांडून दे, करीन तुझी सेवा

माझा खेळ मांडिला वेशीच्या दारी, पारवं घुमतय पारावरी

गोदावरी काठच्या उमाजी नायका, आमच्या गावच्या भुलोजी बायका

एविनी गा तेविनी गा

आमच्या आया तुमच्या आया, खातील काय दुधोंडे

दुधोंडयाची लागली टाळी , आयुष्य दे रे भामाळी

माळी गेला शेता भाता, पाऊस पडला येता जाता

पड पड पावसा थेंबोथेंबी, थेंबोथेंबी आडव्या लोंबी,

आडव्या लोंबती अंगणा

अंगणा तुझी सात वर्षे, भोंडल्या तुझी सोळा वर्षे

अतुल्या मतुल्या चरणी चातुल्या,

चरणी चारचोडे, हातपाय खणखणीत गोडे

एकेक गोडा विसाविसाचा, साड्या डांगर नेसायच्या

नेसा गं नेसा बाहुल्यांनो, अडीच वर्षे पावल्यांनो

           ****


२ ) श्रीकांता कमलाकांता असं कसं झालं.

असं कसं वेडं माझ्या नशिबी आलं

वेडयाच्या बायकोने केले होते लाडू

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

चेंडू चेंडू म्हणून त्याने खेळायला घेतले

वेडयाच्या बायकोने केला होता चिवडा

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

केरकचरा म्हणून त्याने बाहेर फेकला

वेडयाच्या बायकोने केल्या होत्या करंज्या

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

होड्या होड्या म्हणून त्याने पाण्यात सोडल्या

वेडयाच्या बायकोने केल्या होत्या चकल्या

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

बांगडया बांगड्या म्हणून त्याने हातात घातल्या

वेड्याच्या बायकोने केले होते श्रीखंड

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

क्रीम क्रीम म्हणून त्याने तोंडाला फासले

वेड्याच्या बायकोने केल्या होत्या शेवया

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

गांडूळ गांडूळ म्हणून त्याने फेकून दिल्या.

वेड्याची बायको झोपली होती

तिकडून आला वेडा त्याने डोकावून पाहिले

मेली मेली म्हणून त्याने जाळून टाकले


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३ ) नणंदा भावजया दोघी जणी

घरात नव्हतं तिसरं कोणी

शिंक्यावरचं लोणी खाल्लं कोणी

मी नाही खाल्लं वहिनीनी खाल्लं

आता माझा दादा येईल गं

दादाच्या मांडावर बसेन गं

दादा तुझी बायको चोरटी

असेल माझी गोरटी

घे काठी घाल पाठी

घराघराची लक्ष्मी मोठी

           ****

४) कृष्णा घालितो लोळण,  आली यशोदा  धावून || धृ ||

काय रे मागतोस बाळा, तुला देते मी आणून

आई मला चंद्र दे आणून, त्याचा चेंडू दे करून

असलं रे कसलं मागणं तुझं जगाच्या वेगळं

कृष्णा घालितो लोळण,  आली यशोदा  धावून...||धृ||

आई मला विंचू दे आणून त्याची अंगठी दे करून

असलं रे कसलं मागणं तुझं जगाच्या वेगळं

कृष्णा घालितो लोळण,  आली यशोदा  धावून....||२||

आई मला साप दे आणून त्याचा चाबूक दे करून

असलं रे कसलं मागणं तुझं जगाच्या वेगळं

कृष्णा घालितो लोळण,  आली यशोदा  धावून...||३||

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५) एक लिंबू झेलू बाई दोन लिंबं झेलू

दोन लिंबं झेलू बाई तीन लिंबं झेलू

तीन लिंबं झेलू बाई चार लिंबं झेलू

चार लिंबं झेलू बाई पाच लिंबं झेलू

पाचा लिंबांचा पाणोठा

माळ घाली हनुमंताला

हनुमंताची निळी घोडी

येता जाता कमळं तोडी

कमळाच्या पाठीमागे लपली राणी

अगं अगं राणी इथे कुठे पाणी

पाणी नव्हे यमुना जमुना

यमुना जमुनाची बारिक वाळू

तेथे खेळे चिल्लारी बाळू

चिल्लारी बाळाला भूक लागली

सोन्याच्या शिंपीने दूध पाजले

पाटावरच्या गादीवर निजविले

निज रे निज रे चिल्लारी बाळा

मी तर जाते सोनार वाडा

सोनार दादा सोनार दादा

गौरीचे मोती झाले की नाही

गौरीच्या घरी तांब्याच्या चुली

भोजन घातले आवळीखाली

उष्टया पत्रावळी चिंचेखाली

पान सुपारी उद्या दुपारी.. 

           *****

६ ) अक्कण माती चिक्कण माती , खळगा जो खणावा

अस्सा खळगा सुरेख बाई, जातं ते रोवावं

अस्सं जातं सुरेख बाई, रवा-पिठी काढावी

अश्शी रवा-पिठी सुरेख बाई करंज्या कराव्या

अशा करंज्या सुरेख बाई तबकी भराव्या

अस्सं तबक सुरेख बाई शेल्याने झाकावं

अस्सा शेला सुरेख बाई पालखीत ठेवावा

अशी पालखी सुरेख बाई माहेरी धाडावी

अस्सं माहेर सुरेख बाई खायला मिळतं

अस्सं सासर द्वाड बाई कोंडोनी मारीतं

अस्सं आजोळ गोड बाई, खेळायला मिळतं

        *****

७ ) अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता बत्ता

भुलाबाईला लेक झाला नाव ठेवा दत्ता ॥१॥


अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता वाटी

भुलोजीला लेक झाली नाव ठेवा चाटी ॥२॥

अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होती भाकर

भुलाबाईला लेक झाला नाव ठेवा प्रभाकर ॥३॥

अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता चेंडू

भुलोजीला लेक झाला नाव ठेवा बंडू  ॥४॥


अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता चष्मा

भुलाबाईला लेक झाली नाव ठेवा सुषमा / रेश्मा  ॥५॥


अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता रुपया बंधा 

भुलोजीला लेक झाली नाव ठेवा चंदा  ॥६॥


अडकीत जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत ठेवला अडकित्ता

भुलाबाईला मुलगी झाली, नाव ठेवलं स्मिता ॥७॥


अडकित जाऊ खिडकीत जाऊ खिडकीत होता पाटा

भुलोजीला लेक झाला साखर खडी वाटा, 

बाणा बाई बाणा, स्वदेशी बाणा, गाणे संपले खिरापत आणा ॥५॥

            *****

८ ) कारल्याचा वेल लाव गं सुने ,लाव गं सुने 

मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याचा वेल लावला हो सासुबाई लावला हो सासुबाई 

आता तरी जाऊ का माहेरा माहेरा ॥१॥

कार्ल्याचा वेल वाढू दे ग सुने वाढू दे ग सुने

मग जा तू आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याचा वेल वाढला हो सासुबाई वाढला हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का मी माहेरा माहेरा ॥२॥

कार्ल्याला फूल येऊ दे गं सुने येऊ दे गं सुने 

मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याला फूल आलं हो सासुबाई आलं हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का माहेरा माहेरा ॥३॥


कार्ल्याला फळ येऊ दे गं सुने येऊ दे गं सुने

मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याला फळ आलं हो सासुबाई आलं हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का माहेरा माहेरा ॥४॥


कार्ल्याची भाजी कर गं सुने कर गं सुने 

मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याची भाजी केली हो सासुबाई केली हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का माहेरा माहेरा ॥५॥


कार्ल्याची भाजी खा गं सुने खा गं सुने

मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा

कार्ल्याची भाजी खाल्ली हो सासुबाई खाल्ली हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का माहेरा माहेरा ॥६॥


आपलं उष्टं काढ ग सुने काढ ग सुने

मग जा तू आपल्या माहेरा माहेरा

माझं उष्टं काढलं हो सासुबाई काढलं हो सासुबाई

आता तरी जाऊ का मी माहेरा माहेरा

आणा फणी घाला वेणी जाऊ द्या राणी माहेरा माहेरा

आणली फणी घातली वेणी गेली राणी माहेरा माहेरा ॥७॥

            *****

९ ) आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे सोमवार । शंकराला नमस्कार ।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे मंगळवार । देवीला नमस्कार ।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे बुधवार । बृहस्पतीला नमस्कार ।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे गुरुवार । दत्ताला नमस्कार।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे शुक्रवार । अंबाबाईला नमस्कार ।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार?

आज आहे शनिवार । शनिला नमस्कार ।

आज कोण वार बाई । आज कोण वार ?

आज आहे रविवार । सूर्याला नमस्कार ।

         *****

१०) काही भागात कारल्याचा वेल ,त्याची पाने गोल गोल तुला न्यायाला कोण कोण आलं.

....

(अशी सुरुवात आहे )


 अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल सासरा

सासर्‍याने काय आणलं ग बाई ?

सासर्‍यानं आणल्या पाटल्या

पाटल्या मी घेत नाही, सांगा मी येत नाही,

चारी दरवाजे लावा ग बाई, झिप्रं कुत्र सोडा ग बाई ॥१॥


अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल सासू

सासूने काय आणलंय गं?

सासुने आणले गोट

गोट मी घेत नाही, सांगा मी येत नाही,

चारी दरवाजे लावा ग बाई, झिप्रं कुत्र सोडा ग बाई ॥२॥

अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल दीर

दीरानं काय आणलं ग बाई ?

दीरानं आणल्या बांगड्या

बांगड्या मी घेत नाही, सांगा मी येत नाही,

चारी दरवाजे लावा ग बाई, झिप्रं कुत्र सोडा ग बाई ॥३॥

अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल जाऊबाई

जावेनं काय आणलं ग बाई ?

जावेनं आणली नथ

नथ मी घेत नाहीं, सांगा मी येत नाही,

चारी दरवाजे लावा ग बाई, झिप्रं कुत्र सोडा ग बाई ॥४॥

अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल नणंद

नणदेने काय आणलंय गं?

नणदेने आणल्या तोरड्या

तोरड्या मी घेत नाही, सांगा मी येत नाही

चारी दरवाजे लावा गं बाई, झिप्रं कुत्र सोडा ग बाई ॥५॥

अरडी गं बाई परडी, परडी एवढं काय गं

परडी एवढं फूल गं, दारी मूल कोण गं?

दारी मूल नवरा

नवर्‍याने काय आणलंय गं?

नवर्‍याने आणलं मंगळसूत्र

मंगळसूत्र मी घेते, सांगा मी येते

चारी दरवाजे उघडा गं बाई, उघडा गं बाई

झिपर्‍या कुत्र्याला बांधा गं बाई, बांधा गं बाई ॥६॥

             *****

११) सासरच्या वाटे कुचूकुचू काटे 

माहेरच्या वाटे नारळ फुटे 

कोण कोण पाहुणा आला गं बाई 

सासरा पाहुणा आला गं बाई 

सासऱ्याने काय काय आणले गं बाई 

सासऱ्यानी आणल्या पाटल्या गं बाई 

पाटल्या मी घेत नाही 

सांगा मी येत नाही 

चारी दारं लावा गं बाई 

झिपरं कुत्रं सोडा गं बाई 

सासरच्या वाटे कुचूकुचू काटे 

माहेरच्या वाटे नारळ फुटे ...

कोण कोण पाहुणा आला गं बाई 

नणंद पाहुणी आला गं बाई 

नणंदेने काय काय आणले गं बाई 

नणंदेने आणला पोहेहार गं बाई 

पोहेहार मी घेत नाही 

सांगा मी येत नाही 

चारी दारं लावा गं बाई 

झिपरं कुत्रं सोडा गं बाई 

सासरच्या वाटे कुचूकुचू काटे 

माहेरच्या वाटे नारळ फुटे ...

कोण कोण पाहुणा आला गं बाई 

दीर पाहुणा आला गं बाई 

दिराने काय काय आणले गं बाई  

दिराने आणले गोठ गं बाई 

गोठ मी घेत नाही 

सांगा मी येत नाही 

चारी दारं लावा गं बाई 

झिपरं कुत्रं सोडा गं बाई 

सासरच्या वाटे कुचूकुचू काटे 

माहेरच्या वाटे नारळ फुटे 

कोण कोण पाहुणा आला गं बाई 

सासू पाहुणी आला गं बाई 

सासूने काय काय आणले गं बाई 

सासूने आणला राणीहार गं बाई 

राणीहार मी घेत नाही 

सांगा मी येत नाही 

चारी दारं लावा गं बाई 

झिपरं कुत्रं सोडा गं बाई 

सासरच्या वाटे कुचूकुचू काटे 

माहेरच्या वाटे नारळ फुटे ...

कोण कोण पाहुणा आला गं बाई 

नवरा पाहुणा आला गं बाई 

नवऱ्याने काय काय आणले गं बाई 

नवऱ्याने  मंगळसूत्र आणले गं बाई 

मंगळसूत्र मी घेते  

सांगा मी येते 

चारी दारं उघडा गं बाई 

झिपरं कुत्रं आवरा गं बाई 

          ******

१२ ) हस्त हा जीवनाचा राजा

पावतो जनांचिया काजा 

तयासी नमस्कार माझा ।। 

दहा मधले आठ गेले

हस्ताची ही पाळी आली

म्हणोनी त्याने गंमत केली ।।


ज्याच्या योगे झाला चिखल

त्याही चिखलात लावल्या केळी ।। 


एकेक केळ मोठालं 

भोंडल्या देवा वाहिलं

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१३ ) माझ्या सुंद्रीचं लगीन

वराडी कोण कोण येणार, माझ्या सुंद्रीचं लगीन

भाऊ म्हणे मी भाऊ, आणीन नवरा पाहून

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

बहिण म्हणे मी बहीण, करवली मी होईन

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

बाप म्हणे मी बाप, खर्चीन हुंडा लाख

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

आई म्हणे मी आई, करीन लग्नात घाई

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

चुलता म्हणे मी चुलता, येईन जेवणापुरता

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

चुलती म्हणे मी चुलती, 

येईन वरातीपुरती 

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

मावसा म्हणे मी मावसा, 

बसेन दागिन्यासरसा

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

मावशी म्हणे मी मावशी, फराळाचे माझ्यापाशी

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

मामा म्हणे मी मामा, 

येईन सर्व कामा

माझ्या सुंद्रीचं लगीन


भट म्हणे मी भट, 

धरीन अंतरपाट

माझ्या सुंद्रीचं लगीन


भटीण म्हणे मी भटीण, सगळ्याच पोळ्या लाटीन

माझ्या सुंद्रीचं लगीन

            *****

१४ ) सासरच्या जाच सांगणाऱ्या ह्या मुली सासरची बढाई सुद्धा तेवढीच रंगवून सांगायच्या. 


भुलाबाई भुलाबाई सासरे कसे गं सासरे कसे?

कचेरीत बसले हे वकील जसे गं वकील जसे ॥१॥

भुलाबाई भुलाबाई सासू कशा गं सासू कशा?

कपाळभर कुंकू पाटलीण जशा गं पाटलीण जशा ॥२॥

भुलाबाई भुलाबाई पुतणे कसे गं पुतणे कसे?

हातामध्ये घडी मास्तर जसे गं मास्तर जसे ॥३॥

भुलाबाई भुलाबाई जाऊ कशी गं जाऊ कशी?

हातामध्ये लाटणं स्वयंपाकीण जशी गं स्वयंपाकीण जशी ॥४॥

भुलाबाई भुलाबाई दीर कसे गं दीर कसे?

डोळ्यावर गॉगल डॉक्टर जसे गं डॉक्टर जसे ॥५॥

भुलाबाई भुलाबाई नणंद कशी गं नणंद कशी?

हातामध्ये घडी मास्तरीन जशी गं मास्तरीन जशी ॥६॥


भुलाबाई भुलाबाई पती कसे गं पती कसे?

जटातून गंगा वाहे शंकरजी जसे गं शंकरजी जसे ॥७॥


भुलाबाई भुलाबाई आपण कशा गं आपण कशा?

शंकराच्या मांडीवर पार्वती जशा गं पार्वती जशा ॥८॥


भुलाबाई भुलाबाई मुल कसे गं मुल कसे?

वाकड्या सोंडेचे गणपती जसे गं गणपती जसे ॥९॥

              ****

१५) माहेरचा बडेजाव सांगणाऱ्या स्त्रीला मुद्दाम हिणवणारे हे गाणे :- 


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिल्या मला साखळ्या ।'

'असल्या कसल्या साखळ्या बाई फुलाच्या पाकळ्या ॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिल्या मला पाटल्या ।'

'असल्या कसल्या पाटल्या बाई हाताल्या दाटल्या ॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिले मला गोट ।'

'असले कसले गोट बाई हत्तीचे रोट॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिली मला बिंदी ।'

'असली कसली बिंदी बाई कपाळाला चिंधी ॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझा ग माहेरच्यांनी दिला मला हत्ती ।'

'असला कसला हत्ती बाई उधळतो माती ॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिला मला गडी ।'

'असला कसला गडी बाई, मिजास बडी ॥'


'तुझ्या ग माहेरच्यांनी काय काय दिलं ?'

'माझ्या ग माहेरच्यांनी दिली मला बाई ।'

असली कसली बाई तिला रीतच न्हाई


*****

१६ ) आड बाई आडोणी, 

आडाचं पाणी काढोणी।

आडात पडली सुपारी, 

आमचा भोंडला दुपारी ।।


आड बाई आडोणी 

आडाचं पाणी काढोणी।

आडात पडली मासोळी 

आमचा भोंडला संध्याकाळी ।। 


आड बाई आडोणी 

आडाचं पाणी काढोणी।

आडात पडली कात्री 

आमचा भोंडला रात्री ।। 


आड बाई आडोणी 

आडाचं पाणी काढोणी।

आडात पडला शिंपला 

आमचा भोंडला संपला


*********

 जीवनाचे सार या भोंडल्या किंवा हादग्या मधे सांगितले आहे.

हस्त नक्षत्र परतीचा कधीही कुठेही न सांगता येणारा जोरदार पाऊस हत्ती सारखा ज्याला समोर ठेवून मुलींचे महिलांचे गाणे हसत खेळत म्हंटले जाते यामागे खूप 

खूप मोठ्ठे अनुभव जगण्यास छानसे संदेश दिलेले आहेत म्हणूनच भोंडला- हादगा हे मुलींनी,

महिलांनी खेळत संस्कृती जपली पाहिजे & पुढच्या पिढीपर्यंत पोहोचवायला  पाहिजे. 

जिन स्मरण

• णमोकार मन्त्र  https://youtu.be/fUntR5T4bJQ?feature=shared • भक्तामर स्तोत्रम् https://youtu.be/UPF4YwJKFIQ?si=9tlAC0T3fTx7H7uy • गणधर वलय...