शक्तिशाली देश अपने रास्ते जैसे तैसे बना लेंगे और कमजोर देश गृहयुद्ध में उलझे रहेंगे।
प्राचीन काल मे सिर्फ भारत और चीन निर्यात के सम्राट थे। दोनों देश यूरोप को अपना सामान बेचते थे, भारत इसके लिये अपना सिल्क रुट प्रयोग करता था। राजस्थान से ऊँट पर सामान लाहौर पेशावर और कांधार होते हुए मध्य एशिया में प्रवेश करता था और वहाँ से यूरोप। चीन सीधे उज्बेकिस्तान से सामान भेजता था।
लेकिन अब समीकरण बदल गए है, बीच मे पाकिस्तान आ गया है जिसने हमारा सिल्क रुट रोक दिया है। चीन भी मध्य एशिया में दुश्मनी निभाये बैठा है। ऐसे में दोनों देशों ने अलग अलग रास्ते बना लिए।
चीन ने बेल्ट एंड रोड अभियान चलाया, उद्देश्य तो दूसरे देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का था लेकिन चीन कर्ज के जाल में फसाने लग गया। एक बार को तो चीन ने इटली को इसमे शामिल करके नाटो देशों की नींद उड़ा दी थी। लेकिन जब से जॉर्जिया मेलोनी सत्ता में आयी उन्होंने इस BRI प्रोजेक्ट को लगभग बाहर कर दिया है।
चीन इसी वजह से धरा रह गया, दूसरी ओर भारत ने पहले पाकिस्तान से बात की जो कि निःसन्देह बननी ही नही थी। फिर भारत ने ईरान को अप्रोच किया लेकिन ईरान पर प्रतिबंध इतने लगे है कि जिसकी हद नही।
लेकिन दिल्ली डिक्लेरेशन ने भारत की किस्मत हमेशा के लिये बदल दी। भारत को अब पुराने सिल्क रूट की जरूरत ही नही पड़ी। भारत मिडिल ईस्ट कॉरिडोर 5 साल में बन जायेगा। उद्देश्य है कि गुजरात या मुंबई से पहले सारा समान जहाजो में भरकर दुबई जाएगा वहाँ से ट्रेन कनेक्शन होगा और ये सऊदी अरब, जॉर्डन तथा इजरायल पहुँचेगा।
इजरायल में अडानी जी का बंदरगाह पहले ही है वहाँ से यह सामान ग्रीस और इटली पहुँच जाएगा। यदि पाकिस्तान सिल्क रुट बना लेने देता तो भारत का भारी नुकसान होता क्योकि उसमें 1 दर्जन से ज्यादा देशों पर निर्भरता बढ़ती समय भी लगता।
लेकिन अरब के द्वार जिस तरह से खुले है वो अभूतपूर्व है, पाकिस्तान के पास कमाई का बहुत अच्छा साधन होता लेकिन अपने अहंकार में वो अब कही का नही बचा क्योकि भारत के अलावा और कोई देश नही है जिसे निर्यात के लिये पाकिस्तान की आवश्यकता हो। बीच मे होकर भी अकेला होना इसे कहते है।
इसमे और भी देशों का नुकसान हुआ है तुर्की की जरूरत 60% समाप्त हो गयी है। मिस्र को भी नुकसान हुआ है क्योकि उसकी स्विस कनाल ना के बराबर प्रयोग होगी। हालांकि मिस्र को भारत ने आश्वासन दिया है कि मध्य अफ्रीका में निर्यात के लिये उसकी धरती भी हम प्रयोग में लेंगे।
लेकिन सबसे बड़ा कष्ट चीन को पहुँचा है उसके पास एक ही तरीका बचा है कि वो भारत से संबंध सुधारे और एक चीन भारत कॉरिडोर की सोचे लेकिन ये आज के समय मे तो बस ख्याली पुलाव है।
2013 में एक समय था जब महान अर्थशास्त्री सोच रहे थे कि बिना चीन के तो हम यूरोप से जुड़ नही पाएंगे। 2023 में एक समय है जब चायवाले ने भारत को सीधे अरब और यूरोप से जोड़ दिया तथा चीन को साइड में बैठा दिया।
एक वोट की ताकत यही होती है, 2024 में सिर्फ भारत को देखकर वोट मत कीजिये। यह वोट अरब और यूरोपीय देशों को देखकर भी कीजिये जहाँ के लाखों लोगों की आशाएं इस एक कॉरिडोर पर टिकी है।
अंत मे फिर वही की भारत, सऊदी और इटली जैसे ताकतवर देश तो अपना रास्ता बना लेते है लेकिन चीन और पाकिस्तान जैसे कमजोर देश घमंड की आग में जलकर पूरी दुनिया से कट जाते है।
जय हिंद जय हिन्दुराष्ट्रम